गुलामी की जंजीरों से AI कोर्ट तक: क्या भारत अपने अदालती बैकलॉग को ठीक कर सकता है?
Автор: New India Editor - Hindi
Загружено: 2026-02-15
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"न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना है" (Justice delayed is justice denied)। यह कहावत पुरानी है लेकिन आज भी उतनी ही सच है। इस एपिसोड में, हम भारतीय कानूनी प्रणाली में हो रहे बड़े बदलावों का विश्लेषण करेंगे। हम शुरुआत करेंगे उस दिल दहला देने वाली कहानी से जहाँ एक कांस्टेबल को 30 साल की सुनवाई के बाद बरी किया गया, लेकिन अगले ही दिन उसका निधन हो गया।वहाँ से, हम उन संरचनात्मक बदलावों पर चर्चा करेंगे जिनका उद्देश्य भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकना है। हम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) पर बात करेंगे, जो जांच और निर्णयों के लिए सख्त समय सीमा निर्धारित करती है। हम ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट पर भी नज़र डालेंगे, जहाँ 5.1 करोड़ लंबित मामलों के बोझ को कम करने के लिए AI और ब्लॉकचेन जैसी तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है।
• कानूनों का वि-औपनिवेशीकरण (Decolonizing Law): IPC और CrPC को अब क्यों बदला गया?
• ट्रिब्यूनल का जाल: क्या NCLT और DRT जैसे ट्रिब्यूनल वास्तव में तेज़ हैं, या वे अपने ही जाल में फँस गए हैं?
• डिजिटल न्याय: कैसे नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) और वर्चुअल कोर्ट लाखों चालान और मामलों को ऑनलाइन निपटा रहे हैं।
• ADR तंत्र: अनौपचारिक और औपचारिक न्याय के बीच की खाई को पाटने में लोक अदालतों की प्रभावशीलता।यह समझने के लिए ट्यून इन करें कि क्या ये सुधार भारतीय न्यायपालिका के लिए एक वास्तविक मोड़ हैं या सिर्फ "दिखावा"।
स्रोत: इंडिया जस्टिस रिपोर्ट, भारत का आर्थिक सर्वेक्षण, कानून और न्याय मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्तियां।
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