Bazm Se Jab Nigar Uthata Hai |John Elia | Zazabor
Автор: Zazabor (The Lyric Nomad)
Загружено: 2026-01-18
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Описание:
Poet- John Elia
Composition - Zazabor
बज़्म से जब निगार उठता है..।।
मेरे दिल से ग़ुबार उठता है ।।
तेरी सूरत को देख कर मिरी जाँ...।।
ख़ुद-बख़ुद दिल में प्यार उठता है।।
कौन है जिस को जाँ अज़ीज़ नहीं।।
ले तिरा जाँ-निसार उठता है।।
सफ़-ब-सफ़ आ खड़े हुए हैं ग़ज़ाल।।
दश्त से ख़ाकसार उठता है।।
है ये तेशा कि एक शो'ला सा।।
बर-सर-ए-कोहसार उठता है।।
कर्ब-ए-तन्हाई है वो शय कि ख़ुदा।
आदमी को पुकार उठता है।
लो वो मजबूर शहर-ए-सहरा से।।
आज दीवाना-वार उठता है।।
'जौन' उठता है यूँ कहो या'नी,
'मीर'-ओ-'ग़ालिब' का यार उठता है,
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