World's Highest Railway Arch Bridge on Chenab River | चेनाब रेल ब्रिज | Chenab Bridge Latest Update
Автор: Animatic Dreams
Загружено: 2026-02-06
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आज हम समय और बादलों को चीरते हुए उस मुकाम पर चलेंगे जहाँ इंजीनियरिंग, कुदरत के सबसे क्रूर इम्तिहानों से टकराई है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं धरती से ३५९ मीटर ऊपर झूलते भारत के 'कवच' यानी चेनाब ब्रिज की, जिसकी कहानी की शुरुआत उस असंभव सपने से होती है जिसे २००३ में देखा गया था। लेकिन इस ब्रिज का सबसे बड़ा दुश्मन कोई पाकिस्तान या चीन नहीं, बल्कि यहाँ की तेज हवाएं थीं जो २६६ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलती है। जब मेन आर्च बनाने का समय आया तो इंजीनियर्स के सामने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हुआ। क्योंकि दुनिया की कोई भी क्रेन ब्रिज के सेगमेंट को उठाकर उन्हें नदी के बीचोबीच पहुंचा नहीं सकती थी। इसलिए इंजीनियर्स ने पहले नदी के दोनों किनारों पर १२० मीटर और १०० मीटर ऊंचे टावर्स बनाए और ९१५ मीटर स्पैन वाली दुनिया की सबसे बड़ी केबल क्रेन का निर्माण किया जो ३५ टन तक के वेट को आसानी से उठा सकती थी। केबल क्रेन बन जाने के बाद ब्रिज के सेगमेंट को क्रेन से आर्च की शेप में जोड़ने का काम दोनों तरफ से शुरू हुआ। इन segments को जोड़ने के लिए HSFG Bolt यानी high strength frequency grip Bolt का use किया गया। आप ये जानकर दंग रह जाएंगे कि इस पूरे ब्रिज को बनाने के लिए करीब ६ लाख HSFG bolt का use किया गया। आर्च के एक एक segment को आर्च की शेप में जोड़ दिया गया। अंत में समय आया दोनों तरफ से बनते हुए आ रहे इन segments के छोरों को बीच में जोड़ने का। इसके लिए इंजीनियर्स को पहले दोनों segments के छोरों को मिलीमीटर लेवल पर अलाइन करना जरूरी था। पर यहां की तेज हवाएं इन छोरों को अलाइन करने में बहुत दिक्कत कर रही थी। इसलिए इंजीनियर्स ने इन छोरों को अलाइन करने के लिए हाइड्रॉलिक जैक का use किया जो दोनों segments को horizontally और vertically अलाइन कर सकता था। आर्च बन जाने के बाद USAKE UPAR डेक सपोर्टिंग पियर्स इरेक्ट किए गए और डेक भी बना दिया गया। करीब १४५०० टन स्टील का इस्तेमाल ब्रिज का डेक बनाने में और १०६२० टन स्टील आर्च बनाने में हुआ। १३ अगस्त, २०२२ को डेक के दोनों छोरों को आर्च के ऊपर बिल्कुल बीच में सटीकता से जोड़ने का काम पूरा हुआ और इसी joint को हमारे इंजीनियर्स ने "Golden Joint" नाम दिया। निर्माण की और बारीकियों में जाएँ तो दुनिया के सबसे बेहतरीन "टेकला स्ट्रक्चर सॉफ्टवेयर" ने इसके हर नट बोल्ट को पहले कंप्यूटर पर जोड़ा और फिर हकीकत में "golden joint" के रोंगटे खड़े कर देने वाले पल ने दोनों छोरों को मिलाया। यह पुल 'Non linear aerodynamics' की तर्ज पर बना है। Non-linear aerodynamics यानी, अगर हवा का रुख अचानक बदल भी जाए, तो यह पुल टूटने के बजाय, हवा के साथ हल्का सा झूलेगा, बिलकुल एक पेड़ की तरह। इंजीनियरिंग की भाषा में कहे तो इसे 'Aeroelastic Flutter' से बचना कहते हैं। वैसे तो सोशल मीडिया पर लोग इसे 'ब्रिज' कहते हैं, लेकिन हमारी मिलिट्री इसे एक 'बंकर' से कम नहीं मानती। ऐसा क्यों? क्योंकी, दुश्मन अगर ४० किलो TNT विस्फोटक भी पिलर के पास रखकर उड़ाना चाहे, तो भी इस ब्रिज का बाल भी बांका नहीं होगा। क्योंकी, चेनाब ब्रिज में इस्तेमाल हुआ स्टील कोई साधारण स्टील नहीं है। इसे विशेष तौर पर DRDO की सलाह पर तैयार किया गया "Blast proof steel" है। इस ब्रिज को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि अगर ब्रिज का कोई एक पियर टूट जाता है तो भी ट्रेन बिना किसी रुकावट के चलती रहेगी। लेकिन ट्रेन की स्पीड ब्रिज की maximum स्पीड लिमिट, यानी १०० किलो मीटर प्रति घंटे से घटाकर ३५ किलो मीटर प्रति घंटा करनी होगी। चेनाब ब्रिज में १२० से ज्यादा सेंसर्स लगे हैं और ये सेंसर्स दिल्ली में बने एक modern control रूम को रीयल-टाइम डेटा भेजते हैं, जहाँ १५० सर्वर दिन-रात इन sensors से भेजा हुआ डेटा प्रोसेस करते रहते है। जैसे, हवा की रफ़्तार अगर अचानक बढ़ी तो सेंसर अलर्ट कर देगा। अगर कहीं कोई नट ढीला हो जाता है तो इसमें लगे sensors तुरंत कंट्रोल रूम को अलर्ट कर देंगे। सिर्फ इतना ही नहीं, अगर ट्रेन आ रही है और अचानक भूकंप के झटके महसूस हुए तो ब्रिज में लगे sensors ऑटोमैटिक ट्रैक पर लगे रेड सिग्नल को activate कर देंगे और ट्रेन को रोक दिया जाएगा जिसके जरिए होनेवाली बहुत बड़ी आपत्ती को आसानी से टाला जा सकेगा। इंजिनियरिंग की भाषा में इस टेक्नोलॉजी को "स्ट्रक्चरल हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम" कहते है। आइफिल टावर को हर ७ साल में पेंट करना पड़ता है, लेकिन चेनाब ब्रिज को "Akzonobel" के खास पेंट से पेंट किया गया है, जो इसे २५ से ३५ साल तक जंग से बचाएगा। आज यह ब्रिज न केवल आइफिल टावर से ३५ मीटर ऊँचा है बल्कि १२० साल की वारंटी के साथ कश्मीर को कन्याकुमारी से जोड़कर सामरिक और आर्थिक शक्ति का ऐसा प्रतीक बन गया है जिस पर दौड़ती वंदे भारत ट्रेन की गूंज पाकिस्तान की सीमाओं तक सुनाई देती है, जो साबित करती है कि यह सिर्फ स्टील और कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि 'आत्मनिर्भर भारत' का वो अटल संकल्प है जो बादलों के ऊपर अपना साम्राज्य स्थापित कर चुका है।
वंदे भारत 🇮🇳🇮🇳🇮🇳
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