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यशवंतराव होल्कर की वीर गाथा || Yashwantrao Holkar ||

Yashwantrao Holkar

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यशवंतराव होल्कर

यशवंतराव

होल्कर

Yashwantrao Holkar vir gatha

Автор: BBL studio

Загружено: 2023-11-01

Просмотров: 68

Описание: यशवंतराव होल्कर
जन्म 3 दिसंबर 1776 मालवा
मृत्यु 28 अक्टूबर 1811 भानपुरा मध्यप्रदेश
महाराजा यशवंतराव होलकर धनगर-गड़रिया समाज से ताल्लुक रखते थे और विश्व के महान शासकों में से एक थे, इसके बावजूद वे इतिहास के पन्नों में जैसे खो गए हैं। अचरज की बात यह है कि आज भी लोगों को उनके बारे में पता नही । इतिहासकार एन एस इनामदार ने यशवंतराव की तुलना नेपोलियन बोनापार्ट से की है। जबकि सच यह है कि जब महाराज यशवंत राव होल्कर युद्ध जीत रहे थे तब नेपोलियन सेना मे भर्ती तक नही हुआ था। इसलिए नेपोलियन को फ्रांस का यशवंतराव होलकर कहना सही होगा । और नेपोलियन अपने अंतिम समय मे युद्ध हार गया और अंग्रेजो की कैद मे ही मर गया जबकि महाराजा यशवंतराव होलकर अजेय रहे और अंग्रेज़ कभी उनपर अपना अधिकार नही जमा पाये।
यशवंतराव होलकर का जन्म वर्ष 1776 में हुआ था। होलकर के बड़े भाई को ग्वालियर के शासक दौलतराव सिंधिया ने छल से मरवा दिया था। इसके बाद पश्चिम मध्यप्रदेश की मालवा रियासत को यशवंतराव ने संभाला। होलकर न केवल चतुर थे, बल्कि बहादुरी में भी उनका सानी नहीं था।
उनकी वीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1802 में उन्होंने अपने भाई का बदला लेते हुए पुणे के पेशवा बाजीराव द्वितीय व सिंधिया की मिलीजुली सेना को मात दे दी और इंदौर वापस आ गये।
इसी दौर में अंग्रेजों का भी वर्चस्व बढ़ रहा था। रियासतों को डरा-धमका कर और लालच देकर अंग्रेजी शासन में मिलाया जा रहा था। यह होलकर को बिल्कुल भी मंजूर नही था।
अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए उन्होंने नागपुर के भोंसले और ग्वालियर के सिंधिया से एक बार फिर हाथ मिलाया और अंग्रेजों को मार भगाने का प्रण लिया। लेकिन पुरानी दुश्मनी के कारण भोंसले और सिंधिया ने उन्हें फिर धोखा दिया और यशवंतराव एक बार फिर अकेले पड़ गए।
इसके बाद उन्होंने अकेले अपने दम पर अंग्रेजों को छठी का दूध याद दिलाने की ठानी। 8 जून 1804 को उन्होंने अंग्रेजों की सेना को धूल चटाई। फिर 8 जुलाई 1804 में कोटा में अंग्रेजों को पराजय का सामना करना पड़ा। अंग्रेज हर कोशिश में नाकाम हो रहे थे।
अंग्रेजों ने पुन: नवंबर में कोशिश की और बड़ा हमला किया। इस युद्ध में भरतपुर के महाराज रंजीत सिंह के साथ मिलकर यशवंतराव होलकर ने अंग्रेजों को परास्त कर दिया। कहा जाता है कि इस युद्ध में यशवंतराव की सेना ने 300 अंग्रेजों के नाक कान काट डाले थे।
बाद में अचानक रंजीत सिंह ने भी यशवंतराव का साथ छोड़ दिया और अंग्रजों से हाथ मिला लिया। इसके बाद सिंधिया ने यशवंतराव की बहादुरी देखते हुए उनसे हाथ मिलाया।
लगातार पराजय झेल रहे अंग्रेजों के पास संधि की चाल के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। अंग्रेजों ने एक संधि पत्र भेजा कि वे बिना किसी शर्त के यशवंत के साथ संधि करने को तैयार हैं, उन्हें जो चाहिए, वो मिलेगा। हालांकि, यशवंतराव ने साफ इन्कार कर दिया।
यशवंत सभी शासकों को एकजुट करने में जुटे हुए थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली तो उन्होंने दूसरी चाल चली। उन्होंने वर्ष 1805 में अंग्रेजों के साथ संधि कर ली। अंग्रेजों ने उन्हें स्वतंत्र शासक माना और उनके सारे क्षेत्र लौटा दिए। इसके बाद उन्होंने सिंधिया के साथ मिलकर अंग्रेजों को खदेड़ने की एक और योजना बनाई। उन्होंने सिंधिया को खत लिखा, लेकिन सिंधिया ने दगाबाजी की और वह खत अंग्रेजों को दिखा दिया।
यशवंतराव होलकर हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने भानपुर में गोला-बारूद का कारखाना खोला। वह हर हाल में अंग्रेजों को मार भगाना चाहते थे। इसी दौरान उनका स्वास्थ्य भी गिरने लगा और 28 अक्टूबर 1811 में सिर्फ 35 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।
यशवंतराव ने अपने जीवन में कभी पराजित होना नहीं सीखा था। उन्होंने खुद को बाल्यकाल में ही जंग के मैदान में झोंक दिया था। सोचिए अगर और भारतीय शासकों ने उनका साथ दिया होता तो आज भारत की तस्वीर बदली सी नज़र आती।
यशवंतराव होलकर इतिहास के पन्नों में जरूर कम नज़र आते हों, लेकिन उनकी बहादुरी को किसी कहानीकार की जरूरत नही है।
शत शत नमन वंदे मातरम् जय हिंद

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