अथ राग सरबंग | Ath Raag Sarbang | Amargranth Sahib by Sant Rampal Ji Maharaj
Автор: Satlok Ashram
Загружено: 2023-08-10
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अथ राग सरबंग | Ath Raag Sarbang | Amargranth Sahib by Sant Rampal Ji Maharaj
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ररंकार रटता रहै मन बौरा रे। तुंही तुंही फुनलार। समझ मन बौरा रे।। टेक।।
सोहं शब्द सही मिलै मन बौरा रे। आगै भेद अपार समझ मन बौरा रे।।1।।
जहां ज्ञान ध्यान की गम नहीं मन बौरा रे। सुरति निरति नहीं जाय समझ मन बौरा रे।।2।।
कोटिक प्राणी ध्यान धरें मन बौरा रे। उलट पड़े भौ आय समझ मन बौरा रे।।3।।
सिर साटे का खेल है मन बौरा रे। सूली ऊपर सेज समझ मन बौरा रे।।4।।
जहां संख कोटि रवि झिलमिलैं मन बौरा रे। नूर जहूरं तेज समझ मन बौरा रे।।5।।
कायर भागै देखते मन बौरा रे। सुन अनहद घनघोर समझ मन बौरा रे।।6।।
घावन ही में घावले मन बौरा रे। कोई सूरा रहसी ठौर समझ मन बौरा रे।।7।।
लोझा पीठ न फेर हीं मन बौरा रे। सनमुख अर्पैं शीश समझ मन बौरा रे।।8।।
तन मन मृतक हो रहै मन बोरा रे। तिस भेटे जगदीश समझ मन बौरा रे।।9।।
सतलोक कूँ चालिये मन बौरा रे। संत समागम हेत समझ मन बौरा रे।।10।।
तहां एक गुमट अनूप है मन बौरा रे। जहां छत्र सिहांसन सेत समझ मन बौरा रे।।11।।
जहाँ बिराजै पुरूष कबीर, मन बौरा रे। जहां ढुरैं सुहंगम चँवर समझ मन बौरा रे।।12।।
दास गरीब जहां रते मन बौरा रे। जहां उठें मेहर की लहर समझ मन बौरा रे।।13।। 1।।
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याह काया छिन भंग है मन बौरा रे। सुमरो सिरजनहार समझ मन बौरा रे।। टेक।।
रूंम रूंम धुंनि ध्यान धर मन बौरा रे। नौवें कमल करतार समझ मन बौरा रे।।1।।
यौह लाहा क्यों न लीजिये मन बौरा रे। सुरति निरति कर लीन समझ मन बौरा रे।।2।।
पंछी खोज न पाइये मन बौरा रे। ज्यों दरिया मध्य मीन समझ मन बौरा रे।।3।।
पांच तत्व के मध्य है मन बौरा रे। नौ तत्व लिंग शरीर समझ मन बौरा रे।।4।।
नौ तत्व के से आगै है मन बौरा रे। अजर अमर गुरु कबीर समझ मन बौरा रे।।5।।
सूक्ष्म रूप है तास का मन बौरा रे। चतुर्भुजी चितरंग समझ मन बौरा रे।।6।।
अष्ट भुजा हैं तास मध्य मन बौरा रे। मूरति अचल अभंग समझ मन बौरा रे।।7।।
सहंस भुजा संगीत हैं मन बौरा रे। शिखर सरू बैराठ समझ मन बौरा रे।।8।।
विश्व रूप है तास मध्य मन बौरा रे। गुरु लखाई बाट समझ मन बौरा रे।।9।।
शंख चक्र गदा पदम है मन बौरा रे। कौस्तभ मणि झलकंत समझ मन बौरा रे।।10।।
धनुष बाण मूसल ध्वजा मन बौरा रे। अजब नबेला कंत समझ मन बौरा रे।।11।।
खड्ग धार भुज डंड है मन बौरा रे। फरकैं ध्वजा निशान समझ मन बौरा रे।।12।।
निरख परख कर देख ले मन बौरा रे। साचे सतगुरु कै प्रवान समझ मन बौरा रे।।13।।
ता आगै सत पुरुष है मन बौरा रे। जाकै भुजा असंख समझ मन बौरा रे।।14।।
अनंत कोटि रवि झिलमिलैं मन बौरा रे। हंस उड़ैं बिन पंख समझ मन बौरा रे।।15।।
सेत छत्रा चँवर ढुरैं मन बौरा रे। दामिनी दमक दयाल समझ मन बौरा रे।।16।।
अमर कछ अनहदपुरी मन बौरा रे। सतगुरु नजर निहाल समझ मन बौरा रे।।17।।
अनंत युगन की बाट थी मन बौरा रे। पल अंदर प्रवान समझ मन बौरा रे।।18।।
मेहर दया से पाइये मन बौरा रे। औह दरगह दिवान समझ मन बौरा रे।।19।।
संख योजन पर लाल है मन बौरा रे। दमक्या चिसम्यौं तीर समझ मन बौरा रे।।20।।
दास गरीब लखाइया मन बौरा रे। मुर्शीद मिले कबीर समझ मन बौरा रे।।21।।2।।
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