महालक्ष्मी मंदिर रतलाम | यहाँ भक्तों को मिलता है सोने चाँदी और हीरे का प्रसाद | 4K | दर्शन🙏
Автор: Tilak
Загружено: 2023-08-19
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ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने वाला यह मंत्र न जाने कितने ही भक्तों के जीवन में धन सम्रद्धि , सुख वैभव आदि सभी भोग विलासिताओं को पूर्ण करने वाला है. माता लक्ष्मी प्रसन्न होने पर अपने भक्तों को क्षण भर में रंक से राजा बना देती हैं तथा क्रोधित होने पर पल भर में सब कुछ समाप्त भी कर देतीं हैं. इस प्रकार अपने अलग अलग रूपों में माँ लक्ष्मी मनुष्य की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वालीं हैं. भक्तों देश भर में माँ लक्ष्मी के कई स्थानों में एक ऐसा स्थान भी है जहाँ माता लक्ष्मी और उनके मंदिर का श्रृंगार फूल मालाओं से नहीं बल्कि नोट की गड्डियों से बंधनवार बनाकर तथा असंख्य सोने चांदी के आभूषण एवं दुर्लभ रत्नों द्वारा किया जाता है. सजावट तथ श्रृंगार की ये सभी वस्तुएं भक्तों द्वारा ही माता को अर्पित की जाती हैं. पूरे देश में माता लक्ष्मी का एक मात्र ऐसा स्थान, जहाँ अन्य मंदिरों की तरह श्रधालुओं को प्रसाद के रूप में कोई खाने की वास्तु नहीं अपितु रूपए, पैसे एवं सोने चांदी के आभूषण दिए जातें हैं.
हमारे इस कार्यक्रम दर्शन से जुड़े सभी भक्तों का तिलक परिवार की ओर से हार्दिक अभिनन्दन. तो आइये आज हम आपको दर्शन करवाते हैं. प्रसाद के रूप में भक्तों को धन धान्य वितरित करने वाले “श्री महालक्ष्मी मंदिर"" के
मंदिर के बारे में:
भक्तों, फलते फूलते औध्योगिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध मध्य प्रदेश के रतलाम शहर में माणक चौक पर स्थित है माता महालक्ष्मी को समर्पित देवी श्री महालक्ष्मी जी का बड़ा मंदिर. जहाँ श्रद्धालु सिर्फ लक्ष्मी जी की ही नहीं अपितु कुबेर जी महाराज के भी दर्शन पूजन को आते हैं. करोणों रुपय व गहनों की साज सज्जा के रूप में प्रसिद्द इस मंदिर के विषय में रतलाम में निवास करने वाले बुजुर्गों की माने तो देवी लक्ष्मी साक्षात् इस मंदिर में विराजमान मानी जातीं हैं.
मान्यता है कि महालक्ष्मी के इस मंदिर में नोट रखने से सालभर घर में धन की कमी नहीं रहती है और रसोई में भी बरकत रहती है। यहां से मिलने वाले प्रसाद को लोग शगुन और शुभ मानकर हमेशा अपने पास रखते हैं और कभी खर्च नहीं करते।
मंदिर का इतिहास:
अगर महालक्ष्मी के इस मंदिर के इतिहास की बात करें तो कहा जाता है देवी महालक्ष्मी का यह मंदिर रियासत काल से ही स्थापित है। रियासत काल में महाराजा रतन सिंह राठौर ने रतलाम शहर बसाया था। उसी दौरान उनको माता लक्ष्मी का स्वप्न आया और उन्होंने माता के इस मंदिर की स्थापना की. तथा दिवाली पर धनतेरस के दिन महाराजा रतन सिंह राठौर द्वारा माता के दरबार में शाही खजाने से सोने-चांदी और आभूषण माता के शृंगार के लिए चढ़ाए जाते थे। इसके बाद से यह परंपरा बन गई। जहां आज भी लोग अपनी धन-दौलत मंदिर में शृंगार के लिए चढ़ाते हैं।
मंदिर का गर्भग्रह:
मंदिर में प्रवेश करते ही सामने ही गर्भग्रह में विराजित माता महालक्ष्मी के दर्शन होते हैं. माता की इस अलौकिक प्रतिमा का अपना महत्व है. मां लक्ष्मी की प्रयह तिमा तो एक है, मगर इस एक प्रतिमा में मां लक्ष्मी के दो स्वरूप गजलक्ष्मी और धनलक्ष्मी के दर्शन होते है. तथा यहाँ माँ महालक्ष्मी एक ओर भगवान् गणेश एवं दूसरी ओर माँ सरस्वती के साथ विराजमान हैं. माता की इस अलौकिक दिव्य रूप के दर्शन कर भक्त भाव विभोर हो उठते हैं. भक्तों की आस्था है की यहाँ विराजित माता लक्ष्मी अगर धन समृद्धि देने वाली हैं, तो धन सम्रद्धि की प्राप्ति के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है, जिसके लिए मां सरस्वती का आशीर्वाद जरूरी है. वहीं लक्ष्मी की प्राप्ति के पश्चात मनुष्य की बुध्दि असन्तुलित हो जाती है. इसलिए सद्बुद्धि के लिए भगवान गणेश का आशीर्वाद भी आवश्यक है.इस प्रकार से भक्तों को एक ही स्थान पर अपने जीवन की सभी मूलभूत कामनाओं को पूरा करने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है.
मंदिर में अन्य प्रतिमाएं:
भक्तों, धर्म ग्रंथों एवं पुराणों में मां लक्ष्मी के 8 स्वरूपों का वर्णन है, जिन्हें अष्ट लक्ष्मी कहा जाता है. मां के ये अष्ट लक्ष्मी स्वरूप अपने नाम और रूप के अनुसार भक्तों के दुख दूर करते हैं. तथा माता महालक्ष्मी के इस मंदिर में माता की मुख्य प्रतिमा के अतिरिक्त परिसर में लक्ष्मी जी के अन्य आठ स्वरूपों को भी मंदिर के जीर्णोद्धार के समय स्थापित किया गया है. जिसमें माँ विजय लक्ष्मी, माँ वीर लक्ष्मी, माँ संतान लक्ष्मी, माँ ऐश्वर्य लक्ष्मी, माँ धन लक्ष्मी, श्री लक्ष्मी नारायण जी, माँ धान्य लक्ष्मी, माँ आदि लक्ष्मी जी की सुन्दर प्रतिमाएं विराजित हैं. साथ ही मंदिर के प्रवेश द्वार पर शुभ प्रतीक स्वरुप गज की मूर्ती भी स्थापित की गयी है. माता महालक्ष्मी का यह मंदिर बहुत विशाल तो नहीं किन्तु बहुत ही सुन्दर, दिव्य एवं अपनी विशेषताओं के कारण पूरे देश का एकमात्र अपने जैसा मंदिर है.
श्रेय:
लेखक - याचना अवस्थी
Disclaimer: यहाँ मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहाँ यह बताना जरूरी है कि तिलक किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
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