|| श्रीहनुमानजी भगवान् श्रीरामके सर्वोत्तम दास-भक्तकी कथा || - डॉ स्वामी यादवेन्द्राचार्य जी महाराज
Автор: Dharma Se Destiny Tak
Загружено: 2026-01-07
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Описание:
हनुमान जी भगवान श्रीराम के परम (सर्वश्रेष्ठ) और दासो (सेवक) भक्त थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राम की सेवा और उनके कार्यों को समर्पित कर दिया, और उन्हें भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है, जो शक्ति और निष्काम सेवा का प्रतीक हैं.
*हनुमान जी निष्काम भक्ति:
उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा, उनका एकमात्र लक्ष्य राम-कार्य करना था (जैसे सीता माता की खोज, लंका दहन, संजीवनी लाना).
*पूर्ण समर्पण:
हर कार्य उन्होंने बिना भय और संकोच के, केवल प्रभु राम के लिए किया.
*दास भाव:
वे स्वयं को हमेशा श्रीराम का दास मानते थे और मानते थे कि उनकी शक्ति प्रभु की देन है.
भक्ति का प्रतीक: उन्हें 'राम भक्त हनुमान' के नाम से जाना जाता है और वे शक्ति (बल) और भक्ति (सेवा) का आदर्श समन्वय हैं.
*मुलाकात का पूरा प्रसंग:
स्थान: यह घटना ऋष्यमूक पर्वत के पास, पम्पा सरोवर के तट पर हुई थी।
*कारण:
सुग्रीव बाली के भय से ऋष्यमूक पर्वत पर छिपे हुए थे। जब हनुमान जी ने राम और लक्ष्मण को देखा, तो वे उनके बारे में जानने के लिए ब्राह्मण का वेश धारण कर उनके पास गए।
*संवाद:
हनुमान जी ने राम से उनका परिचय पूछा और राम ने अपनी पूरी कथा सुनाई। राम के वचन सुनकर हनुमान जी भावुक हो गए और उन्होंने अपना परिचय दिया।
*समर्पण:
हनुमान जी राम के चरणों में गिर पड़े और अपना जीवन उनकी सेवा में समर्पित कर दिया। राम ने उन्हें गले लगाया और सुग्रीव से मित्रता हुई, जिसके बाद हनुमान जी ने सीता की खोज में राम की सहायता की।
समुद्र लांघने की तैयारी: राम-रावण युद्ध के बाद सीता माता की खोज के लिए जब वानर सेना दक्षिण दिशा की ओर बढ़ी, तब हनुमान जी ने समुद्र पार करने का निश्चय किया। जामवंत ने उन्हें उनकी असीम शक्ति का स्मरण कराया, जिसके बाद हनुमान जी ने महेंद्र पर्वत से एक विशाल छलांग
*सुरसा:
देवताओं ने हनुमान जी की शक्ति की परीक्षा लेने के लिए सुरसा नामक राक्षसी को भेजा। हनुमान जी ने उसके मुख में प्रवेश किया और फिर उसके पेट से बाहर निकलकर आगे बढ़े।
*सिंहिका:
एक अन्य राक्षसी सिंहिका ने उनकी छाया पकड़कर रोकने का प्रयास किया, लेकिन हनुमान जी ने उसे भी परास्त कर दिया।
*लंका में प्रवेश:
समुद्र पार करने के बाद, हनुमान जी लंका के द्वार पर पहुँचे। वहाँ लंकिनी नामक राक्षसी ने उन्हें रोका। हनुमान जी ने उसे परास्त कर लंका में प्रवेश किया।
*लंका का नजारा:
लंका सोने की बनी हुई थी और अत्यंत भव्य थी। हनुमान जी ने रावण के महल, उसके बगीचों और राक्षसों की गतिविधियों का अवलोकन किया।
*सीता माता की खोज और लंका दहन:
हनुमान जी ने अशोक वाटिका में सीता माता को देखा और उन्हें राम-मुद्रिका देकर उनका विश्वास जीता। इसके बाद,
उन्होंने रावण के कई सेवकों और राक्षसों का वध किया। अंत में, जब उनकी पूँछ में आग लगाई गई, तो उन्होंने उसी आग से पूरी लंका को जलाकर भस्म कर दिया और वापस राम के पास लौट आए।
युद्ध तब हुआ था जब शत्रुघ्नजी भगवान राम के द्वारा छोडे़ गए अश्वमेध यज्ञ की रक्षा के लिए चल रहे थे। ऐसे में भगवान शिव अपने भक्त की रक्षा करने के लिए अपने गणों के साथ रण भूमि में पहुंचे थे। इस युद्ध के दौरान जब राजकुमार पुष्कल मारे गए और शत्रुघ्न मूर्छित होकर गिर गए। तब बजरंगबली ने अद्भुत पराक्रम दिखाया था।
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