श्रीवृन्दावनधाम महिमामृतम
Автор: वृन्दावन वीथिन्ह ( VRINDAVAN VEETHINH )
Загружено: 2026-03-14
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श्री वृन्दावन धाम की महिमा अनंत है। यह केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि साक्षात चिन्मय सत्ता है। शास्त्रों और संतों के अनुभवों के आधार पर श्री वृन्दावन की महिमा के कुछ प्रमुख बिंदु यहाँ प्रस्तुत हैं --
1. साक्षात भगवान का स्वरूप (स्वयं प्रकाश धाम)
शास्त्र कहते हैं कि वृन्दावन भगवान श्रीकृष्ण का हृदय है। भगवान स्वयं कहते हैं— "वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छामि" (मैं वृन्दावन छोड़कर एक पग भी कहीं बाहर नहीं जाता)। यहाँ की रज (धूल) को साक्षात ब्रह्म स्वरूप माना गया है, जिसमें लोटने के लिए बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और देवता भी लालायित रहते हैं।
2. नित्य रास स्थली
वृन्दावन वह स्थान है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण और श्रीजी (श्रीराधा रानी) अपनी अष्ट सखियों के साथ आज भी 'नित्य रास' करते हैं। भक्त मानते हैं कि आज भी मध्यरात्रि में निधिवन और सेवाकुंज में वंशी की मधुर तान गूँजती है। यहाँ की गलियाँ और कुंज आज भी उस दिव्य लीला के साक्षी हैं।
3. 'धाम' और 'ब्रह्म' में अभेद
वृन्दावन की महिमा यह है कि यहाँ 'धाम' (स्थान) और 'नामी' (भगवान) में कोई भेद नहीं है। जैसे भगवान का नाम दिव्य है, वैसे ही वृन्दावन की रज, यहाँ के वृक्ष (तरुवर) और यहाँ की यमुना मैया दिव्य हैं। यहाँ का हर वृक्ष साक्षात तपस्वी ऋषि है, जो युगांतर से प्रभु की सेवा में खड़ा है।
4. प्रेम की पराकाष्ठा
संसार में मुक्ति (मोक्ष) पाना बड़ी बात मानी जाती है, लेकिन वृन्दावन वह स्थान है जहाँ भक्त मुक्ति को भी तुच्छ मानते हैं और केवल 'प्रेम-भक्ति' की याचना करते हैं। यहाँ भगवान ऐश्वर्य रूप (राजा) में नहीं, बल्कि मधुर रूप (एक छोटे बालक या प्रेमी किशोर) के रूप में विराजते हैं। यहाँ 'भक्ति' महारानी साक्षात निवास करती हैं।
5. सहज कृपा और शरणागति
वृन्दावन की सबसे बड़ी महिमा है— 'राधा नाम' की प्रधानता। यहाँ के कण-कण में श्रीजी की कृपा व्याप्त है। कहा जाता है कि अगर कोई अनजाने में भी वृन्दावन की रज अपने मस्तक पर लगा ले, तो उसके जन्म-जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते हैं। यहाँ का 'पागल' (प्रेमी भक्त) भी संसार के बड़े-बड़े विद्वानों से अधिक सुखी माना जाता है।
6. संतों की अनुभूति
श्री हित हरिवंश महाप्रभु, स्वामी हरिदास जी और श्री चैतन्य महाप्रभु जैसे महान संतों ने वृन्दावन की उस गुप्त महिमा को प्रकट किया, जिसमें प्रभु अपने भक्तों के अधीन होकर सेवा स्वीकार करते हैं। यहाँ का 'ब्रजवास' ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।
संक्षेप में कहें तो --
वृन्दावन वह परम धाम है जहाँ पहुँचकर जीव का संसार से संबंध टूट जाता है और परमात्मा से 'नित्य संबंध' जुड़ जाता है। यहाँ की वायु में भी कृष्ण-नाम की गूँज है और यहाँ का जीवन केवल 'लाला' की प्रसन्नता के लिए है।
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