कर्म करो फल ईश्वर पर छोड़ दो। श्री कृष्ण वाणी II सम्पूर्ण भगवद् गीता II श्रीमद् भगवद् गीता सार
Автор: BHAKTI _KI _ANANT_DHARA
Загружено: 2026-02-11
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जीवन एक खेत की तरह है। हम सब अपने-अपने हिस्से की जमीन लेकर इस दुनिया में आते हैं। कोई जमीन उपजाऊ होती है, कोई पत्थरों से भरी, किसी के हिस्से में धूप ज्यादा आती है तो किसी के हिस्से में छाया। लेकिन एक बात सबके लिए समान है — बीज हमें ही बोने पड़ते हैं। कोई और हमारे खेत में आकर हल नहीं चलाएगा। कोई और हमारे हाथों की मेहनत को नहीं जी पाएगा। और यही वह जगह है जहाँ यह वाक्य जीवन का सबसे बड़ा रहस्य बनकर सामने आता है — कर्म करो, फल ईश्वर पर छोड़ दो।
अक्सर हम काम कम और चिंता ज्यादा करते हैं। हम मेहनत शुरू करने से पहले ही परिणाम की कल्पना करने लगते हैं। हम सोचते हैं — अगर सफल नहीं हुए तो? अगर लोग हँस पड़े तो? अगर मेहनत का कोई परिणाम ही न मिला तो? यही डर हमारे कदम रोक देता है। पर क्या आपने कभी देखा है कि सूरज उगते समय यह सोचता है कि आज बादल छा जाएँगे या नहीं? वह बस उगता है। नदी बहते समय यह नहीं पूछती कि समुद्र तक पहुँच पाऊँगी या नहीं। वह बस बहती है। प्रकृति हमें हर दिन यही सिखाती है कि कर्म हमारा धर्म है, परिणाम समय और ईश्वर की व्यवस्था का हिस्सा है।
जब हम फल की चिंता में डूब जाते हैं, तब हमारा ध्यान कर्म से हट जाता है। हम अपना सर्वश्रेष्ठ देने के बजाय आधा-अधूरा प्रयास करते हैं, क्योंकि मन परिणाम के डर से कांप रहा होता है। लेकिन जब हम निश्चिंत होकर, पूरे समर्पण के साथ काम करते हैं और यह विश्वास रखते हैं कि जो भी होगा, सही समय पर होगा — तब हमारे भीतर एक अजीब-सी शांति जन्म लेती है। वह शांति हमें और मजबूत बनाती है।
जीवन में असफलता भी एक तरह का आशीर्वाद है। जब हम परिणाम ईश्वर पर छोड़ देते हैं, तब असफलता हमें तोड़ती नहीं, बल्कि सिखाती है। हम उसे दंड नहीं, दिशा मानने लगते हैं। हर गिरना हमें यह बताता है कि कहाँ कदम संभालने हैं। हर रुकावट हमें यह समझाती है कि शायद कोई और रास्ता हमारे लिए बेहतर है। अगर हम हर परिणाम को अपनी मेहनत का अंतिम सत्य मान लें, तो हम टूट जाएंगे। लेकिन यदि हम हर परिणाम को ईश्वर की योजना का हिस्सा मान लें, तो हम मजबूत बनते जाएंगे।
कर्म करना केवल नौकरी करना या पैसा कमाना नहीं है। कर्म का अर्थ है — अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाना। एक विद्यार्थी का कर्म पढ़ाई है। एक माँ का कर्म अपने बच्चों को प्रेम और संस्कार देना है। एक किसान का कर्म बीज बोना है। एक लेखक का कर्म शब्दों को सच्चाई से गढ़ना है। हर व्यक्ति का कर्म अलग हो सकता है, लेकिन सिद्धांत एक ही है — अपना कार्य पूरे मन से करो, लेकिन उसका परिणाम अपने अहंकार से मत जोड़ो। जब हम फल को अपनी पहचान बना लेते हैं, तब हम सफलता पर घमंड और असफलता पर निराशा में डूब जाते हैं। लेकिन जब हम फल को ईश्वर पर छोड़ देते हैं, तब हम संतुलित रहते हैं। सफलता आए तो आभार, असफलता आए तो धैर्य। यही संतुलन जीवन को सुंदर बनाता है।
कभी-कभी हमें लगता है कि हमारी मेहनत व्यर्थ जा रही है। सालों की कोशिश के बाद भी कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता। ऐसे समय में विश्वास डगमगाने लगता है। लेकिन याद रखिए — बीज जब मिट्टी में दबता है, तब वह अंधेरे में होता है। बाहर से कुछ दिखाई नहीं देता। पर भीतर एक चमत्कार चल रहा होता है। जड़ें बन रही होती हैं। और जब सही समय आता है, तब वही बीज धरती को चीरकर बाहर आता है। हमारी मेहनत भी ऐसी ही होती है। आज नहीं तो कल, उसका असर ज़रूर दिखाई देगा।
“कर्म करो, फल ईश्वर पर छोड़ दो” का अर्थ यह नहीं कि हम लापरवाह हो जाएँ। इसका मतलब यह नहीं कि हम तैयारी अधूरी छोड़ दें और कह दें — जो होगा देखा जाएगा। इसका असली अर्थ है — अपनी पूरी क्षमता से काम करो, लेकिन परिणाम को लेकर बेचैन मत हो। जो हमारे हाथ में है, वह प्रयास है। जो हमारे हाथ में नहीं है, वह परिणाम है। और जो हमारे हाथ में नहीं है, उसके लिए चिंता करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है।
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