हम मन की क्यों सुनते हैं जो पुण्य नहीं हमेशा पाप ही कराता है और मन माया के कारण जीव को सजा मिलता है
Автор: Swami Jay Gurubande Ji Maharaj
Загружено: 2026-01-03
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हमलोग मन के वशीभूत हो गये है तभी तो मन के कारण सबसे प्रेम खत्म हो रहा है बस ईर्ष्या चुगली निंदा करते रहते हैं जिससे जीव को सजा भुगतना पड़ता है।
परम् आराध्य सतगुरु स्वामी जय गुरुबन्दे जी महाराज
जय गुरुबन्दे आश्रम छितौना धाम जाल्हूपुर वाराणसी उत्तर प्रदेश भारत।
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