Shree Abhidhan Rajendra Kosh - 168 रजोहरण / Rajoharan
Автор: Veer Gurudevaay
Загружено: 2025-10-06
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"श्रुत संबोधि"
श्री अभिधान राजेन्द्र कोष प्रवचना
ग्रंथ भाग 6 - शब्द 168 - रजोहरण / Rajoharan
✍🏻 श्लोक 1 - बाह्यं आभ्यन्तरं च रजः हियते अनेन इति रजोहरणम्
🪶 जो साधक की बाह्य और आंतरिक मलिनता को नाश करे वह है रजोहरण
✍🏻 श्लोक 2 - परमार्थतः संयमयोगः तेषां च कारणं इदं
🪶 निश्चय संयमयोग का परम सहायक, निमित्त कारण है रजोहरण
✍🏻 श्लोक 3 - रजः ह्रियते अपनीयते येन तद रजोहरणम्
🪶 आत्मा पर लगी हुई कर्म, मोह, अज्ञानरूपी रज का क्षय होता है वह है रजोहरण
✍🏻 श्लोक 4 - रजोहरणं भवति मानेन प्रमाणेन इति
🪶 32 अंगुल दीर्घ, 24 अंगुल की दंडीवाला, 8 अंगुल की दशीवाला होता है रजोहरण
✍🏻 श्लोक 5 - ऊर्णामयम् वा उष्ट्ररोममयं यत कम्बलं तत् पादप्रोञ्छनं रजोहरणं कर्तव्यं
🪶 साधक निग्रंथदशा प्राप्त करने हेतु उन से बने हुए निर्दोष, निर्मल रजोहरण ग्रहण करते है
✍🏻 श्लोक 6 - तेभ्यः स्मृतं दयार्थं तु, रजोहरण धारणम्
🪶 प्रभु महावीर स्वामी ने विश्व के सूक्ष्मातिसूक्ष्म जीव जो चर्मचक्षु से न देख सके ऐसे जीवों की सुरक्षा, दया, करुणा के लिए रजोहरण का उपदेश दिया है
✍🏻 श्लोक 7 - जन्तवः बहवः सन्ति, दुर्दशा मांसचक्षुवाम्
🪶 14 राजलोक के अत्यंत छोटे जीवो को भी सुरक्षा, अभयदान देने का परमभाव और परम उपकरण है रजौहरण
✍🏻 श्लोक 8 - जे भिक्खू अतिरेगप्पमाणं रयहरणं धरेई धरंतं वा साइज्जइ
🪶 भिक्षु, साधु भगवंत सदा प्रमाणयुक्त रजोहरण ही धारण करते है
✍🏻 श्लोक 9 - एवं जाव सुक्ख मृदुकारणात
🪶 साधक, भिक्षु सदा सुधर्म में लीन होकर परमसुखी होते है
✍🏻 श्लोक 10 - रओ-दव्वे भावे य, तं दुविहंपि रयं हरतीति रयोहरणं
🪶 प्रभु महावीर स्वामी ने दो प्रकार के रज की प्ररूपणा की है
द्रव्यरज - अष्टकर्म के पुदगल
भावरज - मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग
✍🏻 श्लोक 11 - पमज्जंतस्स असंजमते
🪶 साधक प्रमाद के संयोग होने से ही असंयम के योगों में जुडता है
✍🏻 श्लोक 12 - एत्थ वि संजमविराहणा
🪶 साधक प्रतिपल संयम विराधना से मुक्त होने हेतु परम जागृत रहता है
✍🏻 श्लोक 13 - जे भिक्खू रयहरणं अविहीए बंधइ बंधं तं वा साइज्जइ
🪶 भिक्षु जैसे रजोहरण का बंधन अविधि से कभी नही करता है वैसे भिक्षु स्वचेतना को कर्म का तीव्र बंधन हो ऐसे भावों में कभी नही जुडता है
✍🏻 श्लोक 14 - जे भिक्खू रयहरणस्स एक्कबंधं देयइ देयंतं वा साइज्जइ
🪶 भिक्षु सदा रजोहरण का बंधन एकरुप से विधि से करते है वैसे ही भिक्षु सदा स्वचैतन्य का शाश्वत, एकरूप तत्त्व का ही ध्यान करते है
✍🏻 श्लोक 15 - अणादिणो य दोसा बहुबंधणे
🪶 साधक, भिक्षु अनादि के जो कर्मबंधन, दोष है उसे दोषरूप, कर्मरूप मानता है और उसके क्षय हेतु प्रतिपल पुरुषार्थ करता है
✍🏻 श्लोक 16 - सज्झाय, ज्झाणे य पलिमंथो य भवति
🪶 साधु भगवंत प्रभु वीर के वचनो का, आज्ञा का, स्वरुप का स्वाध्याय और ध्यान करके समग्र कर्मो का शीघ्र क्षय करते है
✍🏻 श्लोक 17 - आदौ प्रमाजनार्थं भूम्यादेः लिङ्गार्थं चैव साधो रजोहरणं भवति
🪶 श्रभण भगवंत भूमि, वस्त्र, वसति आदि में जीव की जयणा हेतु जो धारण करते है वह है रजोहरण
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