व्याकुल हृदय को शांत करने के लिए इसे सुन लेना II श्री कृष्ण वाणी II
Автор: BHAKTI _KI _ANANT_DHARA
Загружено: 2026-02-10
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Описание: व्याकुल हृदय को शांत करने के लिए इसे सुन लेना — श्री कृष्ण वाणी” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन के हर उस क्षण का सहारा है जब मन भय, चिंता, असफलता और मोह के जाल में उलझ जाता है। जब परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं होतीं, जब अपने ही पराए लगने लगते हैं, जब परिश्रम के बाद भी सफलता दूर दिखाई देती है और जब भविष्य धुंधला प्रतीत होता है, तब मन अत्यंत व्याकुल हो उठता है। ऐसे समय में श्री कृष्ण की वाणी अमृत के समान है। वे हमें स्मरण कराते हैं कि यह संसार परिवर्तनशील है, सुख और दुख दोनों ही स्थायी नहीं हैं। जिस प्रकार दिन के बाद रात और रात के बाद पुनः दिन आता है, उसी प्रकार जीवन में कठिनाइयाँ भी क्षणिक हैं। श्री कृष्ण कहते हैं — “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” अर्थात् हमारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता करने में नहीं। जब हम फल की चिंता में डूब जाते हैं, तब हमारा मन अशांत हो जाता है; परंतु जब हम अपने कर्तव्य को ईश्वर को समर्पित करके निस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं, तब भीतर एक अद्भुत शांति का अनुभव होता है। व्याकुलता का मूल कारण आसक्ति है — लोगों से, वस्तुओं से, परिणामों से और अपनी कल्पनाओं से। श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं कि प्रेम करो, परंतु आसक्त मत हो; प्रयास करो, परंतु अहंकार मत रखो; संघर्ष करो, परंतु भयभीत मत हो। जब अर्जुन महाभारत के युद्धभूमि में मोह और करुणा से भरकर अपने कर्तव्य से पीछे हटने लगे, तब श्री कृष्ण ने उन्हें आत्मा का ज्ञान दिया। उन्होंने समझाया कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; वह शाश्वत, अजर और अमर है। यह ज्ञान ही व्याकुल हृदय को स्थिर करता है, क्योंकि जब हमें यह बोध हो जाता है कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतन आत्मा हैं, तब संसार की छोटी-छोटी घटनाएँ हमें डगमगाने नहीं पातीं। श्री कृष्ण की वाणी हमें यह भी सिखाती है कि जो हुआ, वह भी उचित था; जो हो रहा है, वह भी उचित है; और जो होगा, वह भी उचित ही होगा। यह विश्वास ही चिंता को विश्वास में, भय को साहस में और व्याकुलता को शांति में बदल देता है। जब मन बहुत अधिक विचलित हो, तब कुछ क्षण आँखें बंद कर श्री कृष्ण का स्मरण करो, उनके शब्दों को हृदय में उतारो और स्वयं से कहो — “मैं अकेला नहीं हूँ, प्रभु मेरे साथ हैं।” जैसे समुद्र की सतह पर लहरें उठती-गिरती रहती हैं, परंतु उसकी गहराई सदैव शांत रहती है, वैसे ही हमें भी बाहरी परिस्थितियों के बीच अपनी आंतरिक गहराई में स्थिर रहना सीखना चाहिए। श्री कृष्ण वाणी हमें यही स्थिरता, यही धैर्य और यही अटल विश्वास प्रदान करती है। अतः जब भी हृदय व्याकुल हो, निराशा घेरे, या जीवन का मार्ग कठिन प्रतीत हो, तब श्री कृष्ण की वाणी को सुन लेना — वही तुम्हारे अशांत मन को शांति, साहस और दिशा प्रदान करेगी।
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