81 Pad and 45 Devtas in Vastu
Автор: Hitchintak
Загружено: 2022-09-13
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वास्तु पुरुष-
भारतिय संस्कृति का मूलाधार देवतत्व है। किसी भी शक्ति को देव के रुप में कल्पना कर हम सहज ही उसे अपने जिवन का अभिन्न अंग मान लेते हैं।
वैदिक काल से ही वास्तु मान्यताओं का आरम्भ हमारे शास्त्रों में मिलता है और इसे परम्परागत् स्विकारा भी गया है। पौराणिक काल से ही वासोष्पति को वास्तुरक्षक, वस्तुनर, वास्तुभूत, वास्तुपुरुष आदि कई नामों से सम्बोधित किया गया है। मण्डुक उपनिषद में वास्तोष्पति अर्थात वास्तु के देवता का रुप वरनर्ण करते हुये कहा गया है कि अग्नि इनका सिर है, सूर्य-चन्द्र इन्के नेत्र हैं, चतुर्थांश इनके कान है और प्रकटीकरण आवाज़ है, वायु इनकी श्वांस है, जगत हृदय और पृथ्वी पैर है।
मतस्यपुराण में वास्तु पुरुष की उत्पति की कथा कुछ इस प्रकार आती है कि एक बार भगवान शिव और उन्हीं के अंश सवरुप दैत्य अंधकासुर में भीष्म युद्ध चल रहा था। इस युद्ध के मध्य भागवान शिव के पसीने की कुछ बुंदे धरती पर गिरी तो वहां एक जीव उतपन्न हुया। देखते ही देखते इस जीव आकार इतना बड़ना शुरु हो गया कि सभी देव और दानव भयभीत हो गये। देवता सोच रहें थे कि यह दानवों का ही कोई सैनीक है और दूसरी तरफ दानव इसे देवताओं का सैनीक मान रहे थे। भय के कारण देव और दानव दोंनौ ही ब्रह्मा जी की शरण में पहुचे और गुहार लागई की यह जीव कौन है? और आगर यह जीव इस रुप में बड़ता गया तो यह पुरी पॄथ्वी का ही भक्षण कर लेगा इस महान् जीव से हमें बचायें। तब ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से देख देव-दानवों को सझाया की यह भगवान शिव के सात्विक तत्व और युद्ध के कारण रौद्र हुये शीव के तामसिक तत्व का मिश्रण स्वरुप अंश है। इसे नियन्त्रित करने के देवों और दानवों को मिल कर ही प्रयास करना होगा। इतने में भयंकर हो रहे जीव आ आकार और बड़ा हो रहा देख दौंनो एकमत हो गये। फिर ब्रह्मा जी के साथ मिल कर सबने उस विराट जीव को धरती पर अधोमुख गिरा दिया। और उसपर सबने मिलकर अपने अपने स्थान पर वास कर लिया।
गिरने के बाद इस जीव ने पूछा की आखीर मेरा कसुर क्या है, क्युँ आप सब ने मुझे नियन्त्रित किया है, और अब मैं औंधे मुख हो कर अपनी भूख-प्यास कैसे मिटाऊगा। उत्तर में ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम शिव के सात्विक और तामसिक दौंनों गुणों के प्रभाव से उत्पन हुये हो, अगर किसी एक गुण की भी अधिकता तुम पर हावी हो गई तो सृष्टि पर प्रकृती का सन्तुलन बिगड़ जायेगा, तुम शिव का अंश हो जिस कारण तुम्हरा अंत सम्भव नहीं है, तुम अमर हो, इसलिये तुम्हें मात्र नियन्त्रित हि किया जा सकता है और यह अब आवश्यक है। और जहां तक रही तुम्हारी भुख की बात तो पृथ्वी पर जो भी भुखण्ड का प्रयोग किसी निज या सर्वजानिक रुप जैसे नगर, ग्राम, दूर्ग, मंदिर तालाब, कूयां, बावड़ी आदि का निर्माण करेगा उसे ही तुम्हारी भुख का ध्यान रखना होगा। ऐसा ना करने वाले को तुम अपनी इच्छानुसार किसी भी प्रकार का फल या दण्ड़ यहां तक की मृत्युदण्ड़ भी दे सकते हो। इस वरदाण के साथ ब्रह्मा जी ने इस जीव को वास्तुपुरुष का नाम देकर आपना मानस पुत्र घोषित कर दिया।
इस कथा का अगर सरल अर्थ देखें तो हमें इसकी व्यवहारीकता का बोध होता है। यहा यह तोअ सपष्ट है कि सात्विक या सुरी या यु कहें कि अच्छे गुण और दूसरी तरफ तामसिक या असुरी शक्तियाँ जिन्हें दूर्गुण भी कहा जा सकता है के समावेश से ही हम मृत्यु लोक पर मानस या मनुष्य के रुप में जन्म लेते हैं। अगर हम इन में से सदगुणों का चयन कर व्यवहार करते हैं तो हमरे कार्य स्वयं के साथ-साथ लोककल्याण में भी सहयोगी होते हैं। तथा सभी हमरे द्वारा कीये गये कार्य से खुश होकर हमें देवतुल्य उपाधी तक दे देते हैं। व वहीं दूसरी ओर अगर हम सिर्फ निजहित में स्वार्थी होकर कार्य करतें हैं या छिना-छपटी में ही अपनी अभिलाषाओं की पूर्ती चाहतें है तो हम मानव होते हूये भी दानव ही माने जाते हैं।
इसी प्रकार अगर हम अपना वह अपने आसपास के वातावारण के साथ साथ प्रकृती के अनुरुप भूमी पर कीसी भी प्रकार का निर्माण करते हैं जिसका कोई भी दूषित प्रभाव ना हो तो हम पायेंगें की हमें जिवन में हर्षोलास के साथ निरोगी काया भी प्राप्त होती है। इसी को वास्तुपूरुष का पूजन या ध्यान कहा गया है। ध्यान को दूसरे शब्दों में एक विशेष कार्य के लिये की गई सम्बन्धित व्यवस्था का मनन कर उसका पूर्ण अनुसरण करना भी कहा जा सकता है। इस प्रकार हम यह मान सकते हैं कि व्यवहारीकता हो देखते हुये हमें हमारे पूर्वजों ने कूछ नियम बनायें होगें जो आज भी यथा सत्यता के प्रतीक हैं।
वास्तुपुरुष को अगर हम यतार्थ शक्तिओं का चित्रण और बहुस्तरीय शक्तियों का समिश्रण समझे जो अपने-अपने निश्चित स्थान को प्रभावित करती हैं तो भवननिर्माण कला को तत्त्वमीमांसक और ब्रह्मांडीय उर्जाओं का प्रयोगीक सर्वेक्षण कर पायेगें।
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