GAYATRI MANTRA | NEELAM NARAYAN | RAJESH GUPTA | RAJESH PANDEY | 108 गायत्री मंत्र |
Автор: BTS ENTERTAINMENT
Загружено: 2022-10-06
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गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्.
मन को शांति एवं तनाव को दूर करने के लिए गायत्री मंत्र का जाप करना अत्यंत लाभकारी होता है. गायत्री मंत्र ही चारों वेदों का मुख्य सार तत्व माना जाता है. गायत्री मंत्र से ही इनकी उत्पत्ति हुई है, इसलिए गायत्री माता को वेद माता कहते हैं. त्रिदेव जिनकी उपासना करते हैं, जिनका ध्यान करते हैं, वह गायत्री माता देव माता हैं. वैशाख के बाद ज्येष्ठ माह में ही गायत्री जयंती है. ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को गायत्री माता प्रकट हुई थीं. गायत्री माता की पूजा करना और मंत्र का जाप करना बहुत ही लाभदायक होता है
गायत्री मंत्र जाप के फायदे
1. गायत्री मंत्र का नियमित जाप करने से मन शांत और एकाग्र रहेगा.
2. इस मंत्र के जाप से दुख, कष्ट, दारिद्रय, पाप आदि दूर होते हैं.
3. संतान प्राप्ति के लिए भी गायत्री मंत्र का जाप किया जाता है.
4. कार्यों में सफलता, करियर में उन्नति आदि के लिए भी गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए.
5. विरोधियों या शत्रुओं में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए घी एवं नारियल के बुरे का हवन करें. उस दौरान गायत्री मंत्र का जाप करते हैं.
6. जिन विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति कमजोर होती है, उनको गायत्री मंत्र का नियमित जाप एक माला करनी चाहिए.
7. पितृदोष, कालसर्प दोष, राहु-केतु तथा शनि दोष की शांति के लिए शिव गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए.
गायत्री मंत्र को एक सर्वश्रेष्ठ मंत्र माना गया है. ऐसी मान्यता है की गायत्री मंत्र में वेदों के मंत्रो का सार है.
गायत्री मंत्र को अच्छे से समझ कर और उसके अर्थ को जानकार इसका नियम पूर्वक जाप करने से मनुष्य के अंदर सकारात्मक बदलाव आता है. उसके मुख पर एक तेज आता है. उस व्यक्ति का बौधिक विकास होता है.
गायत्री मंत्र का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है.
इसके पाठ करने का सबसे सही समय ही ब्रह्म मुहूर्त.
प्रातः काल से लेकर संध्याकाल तक गायत्री मंत्र का पाठ करना शुभ माना गया है.
रात्री काल में गायत्री मंत्र का पाठ नहीं करना चाहिये.
सम्पूर्ण रूप से स्वच्छ होकर और स्नान आदि करने के पश्चात गायत्री मंत्र का पाठ करें.
किसी स्वच्छ आसन पर बैठ कर गायत्री मंत्र का पाठ करें.
अगर आप प्रातः काल में गायत्री मंत्र का पाठ करतें हैं तो आप पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और गायत्री मंत्र का पाठ करें.
अगर आप संध्या काल में गायत्री मंत्र का पाठ कर रहें हैं तो पश्चिम दिशा की ओर मुख कर के बैठना चाहिये और गायत्री मंत्र का पाठ करना चाहिये.
जहाँ तक गायत्री मंत्र के पाठ करने की संख्याँ के बारे में बात है तो आप सात बार, 9 बार या फिर 108 बार गायत्री मंत्र का पाठ कर सकतें हैं.
108 बार गायत्री मंत्र के पाठ को श्रेष्ठ माना जाता है.
अगर आप तिन माला या फिर सात माला गायत्री मंत्र का पाठ करतें हैं तो यह बहुत ही शुभ होता है.
गायत्री मंत्र के पाठ से पूर्व अपने मन और ह्रदय को शांत कर लें.
मन में उठ रहें विचारों को शांत कर लें.
अपने ह्रदय में ऐसा महसूस करें की सारी नकारात्मकता बाहर निकल रही है.
और आपके अंदर एक सकारात्मक उर्जा प्रवेश कर रही है.
गायत्री मंत्र का जाप अगर आप माला से कर रहें है तो आप तुलसी की माला का उपयोग करें, यह शुभ माना जाता है.
आप मन में भी गायत्री मंत्र का पाठ कर सकतें हैं.
मंत्र- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
बुद्धि को निर्मल, पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने का महामंत्र है गायत्री मंत्र. गायत्री माता का आंचल श्रद्धापूर्वक पकड़ने वाला जीवन में कभी निराश नही रहता. गायत्री उपासना का अर्थ है सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाना कि सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही न जा सके.
प्रणव (ॐ) का अर्थ- परमात्मा सभी प्राणियों में समाया हुआ है, इसलिए निष्काम भाव से सभी के प्रति समर्पित होकर कर्म करों.
भू का अर्थ हैं– शरीर अस्थायी औजार मात्र हैं, उस पर अत्यधिक आसक्त न होकर आत्मबल बढ़ाओं श्रेष्ट मार्ग का अनुसरण करो.
भुवः का अर्थ– कुसंस्कारों से जूझता रहने वाला मनुष्य देवत्व को प्राप्त करता हैं.
स्वः का अर्थ– विवेक द्वारा शुद्ध बुद्धि से सत्य को जानने, संयम और त्याग की नीति का आचरण करने के लिए अपने को तथा दूसरों को प्रेरणा देनी चाहिए.
तत का अर्थ- वही बुद्धिमान है, जो जीवन और मरण के रहस्य को जानता हैं. भय और आसक्ति रहित जीवन जीता हैं.
सवितुः का अर्थ– मनुष्य को सूर्य के समान तेजस्वी होना चाहिए और सभी विषय तथा अनुभूतियाँ अपनी आत्मा से ही सम्बन्धित हैं, ऐसा विचारना चाहिए.
वरेण्यम का अर्थ– प्रत्येक को श्रेष्ट देखना, श्रेष्ट चिन्तन करना, श्रेष्ट विचारना, श्रेष्ट कार्य करना चाहिए, पापों से सदैव सावधान रहना चाहिए.
देवस्य का अर्थ– देवताओं के समान शुद्ध दृष्टि रखने से परमार्थ कर्म में निरत रहने से मनुष्य के भीतर और बाहर देवलोक की सरष्टि होती हैं.
धीमहि का अर्थ– हम सब लोग ह्रदय में सब प्रकार की पवित्र शक्तियों को धारण करें. इसके बिना मनुष्य सुख शांति को प्राप्त नही होता.
धियो का अर्थ– शब्द बतलाता है कि बुद्धिमान को चाहिए कि वह उचित अनुचित का निर्णय तर्क, विवेक और न्याय के आधार पर वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए करे.
यो नः का अर्थ– हमारी जो भी शक्तियाँ एवं साधन है, उनके न्यून से न्यून भाग को ही अपनी आवश्यकता के प्रयोग में लाए, शेष निस्वार्थ भाव से असमर्थों में बाँट दे.
प्रचोदयात् का अर्थ– मनुष्य अपने आपकों तथा दूसरों को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे.
Bhaskar T. Shetty, Rajesh Pandey,
Neelam Narayan, Rajesh Gupta,
Pushpraj Gunjan, Amit Aanand,
Anand Prabhakar, Navin Prajapati, Sonam.
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