नाभि चक्र की रक्षा क्यों ज़रूरी है || Shri Mataji Speech
Автор: Divine sahajyog
Загружено: 2026-02-05
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नाभि चक्र की रक्षा क्यों ज़रूरी है || Shri Mataji Speech
यह विषय नाभि चक्र की सूक्ष्म स्थिति और उसके बिगड़ने के कारणों को बहुत गहराई से स्पष्ट करता है। कहा गया है कि यदि हम अपनी नाभि को ठीक रख लें, संतुलित और सुरक्षित रखें, तो जीवन में बहुत-सी मानसिक और भावनात्मक उलझनें अपने-आप समाप्त हो सकती हैं। मृत्यु के संदर्भ में अनावश्यक जुड़ाव, बार-बार मृत्यु, प्रेतलोक, थर्ड आई या अति सूक्ष्म लोकों के बारे में पढ़ना-सोचना मनुष्य की नाभि पर गहरा प्रभाव डालता है। इससे व्यक्ति की लेफ्ट साइड अत्यधिक सक्रिय हो जाती है और अवचेतन में भय, दुख और असंतुलन भर जाता है। इसी प्रकार राइट साइड की भी अपनी गड़बड़ियाँ हैं, जहाँ लोग मंत्रों, नामों और ट्रांस जैसी अवस्थाओं में जाकर यह मान लेते हैं कि परमात्मा उनके भीतर आ गए हैं, जबकि वास्तव में वहाँ आत्मसाक्षात्कार का कोई संबंध नहीं होता।
परमात्मा को ऐसे बुलाना जैसे वे कोई नौकर हों—कभी नौकरी के लिए, कभी बीमारी ठीक करने के लिए—यह भी एक बड़ा भ्रम है। राजा से मिलने के लिए भी कितनी प्रक्रिया होती है, तो जो राजाओं के महाराजा हैं, उनसे बिना योग्यता और संबंध के कैसे जुड़ाव हो सकता है? बिना आत्मा से संबंध जोड़े, केवल नाम रटने से न तो परमात्मा प्राप्त होते हैं और न ही नाभि सुरक्षित रहती है। ऐसे नाम और साधन कई बार नाभि और आज्ञा चक्र को पकड़ लेते हैं और व्यक्ति भीतर से अस्थिर हो जाता है।
यह भी बताया गया है कि राइट साइड से जुड़े अति-महत्वाकांक्षी मृत लोग सुप्राकॉन्शस क्षेत्र से आकर जीवित मनुष्यों में प्रवेश कर सकते हैं। ऐसे लोग जीवन में कभी शांत नहीं रहते, अत्यधिक दौड़-भाग, बेचैनी और बाद में शारीरिक कंपन जैसी समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं। यह भूत-विद्या का क्षेत्र है, जिसे समझे बिना उसमें पड़ना बहुत खतरनाक है। ऐसे मार्गों में केवल नाम जपने को कहा जाता है, पर वास्तविक ज्ञान या कुंडलिनी की बारीक समझ नहीं दी जाती।
नाभि चक्र की सबसे बड़ी सुरक्षा तब होती है जब मनुष्य की खोज आत्मा की होती है, स्पिरिट की होती है। जब खोज सांसारिक लालच, शक्ति या पैसा बन जाती है, तब नाभि कभी सुरक्षित नहीं रह सकती। हमारे समाज में धन के पीछे अंधी दौड़, झूठ, छल और अन्याय को जायज़ ठहराना “पिता के विरुद्ध पाप” कहा गया है, क्योंकि हम यह भूल जाते हैं कि परमात्मा हमारे पिता हैं, सर्वशक्तिमान हैं और सब कुछ देख रहे हैं। यदि हमें यह बोध हो जाए कि वे हमारे अपने हैं और वही हमें संभाल रहे हैं, तो भय, लालच और असंतोष अपने-आप समाप्त हो जाए। संतोष में जो आनंद है, वह न तो बैंक बैलेंस में है और न ही भौतिक संग्रह में।
Reference :- 1979 - 0314 ( Part 3 ) completed || Divine Sahajyog
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