रावण का कुम्भकरण वियोग । अतिकाय का लक्ष्मण को ललकारना । नरान्तक देवान्तक मृत्यु | Ramayan Katha
Автор: Bharat Ki Amar Kahaniyan
Загружено: 2026-02-06
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युद्धभूमि में कुम्भकरण के मारे जाने के समाचार पर रावण को सहज विश्वास नहीं होता। काफी देर बाद वह मानता है कि उसका भाई धराशाही हो चुका है। वह कहता है कि आज उसकी दायीं भुजा कट गयी। रावण को आभास होने लगता है कि अब असुर जाति के अन्त का समय आ गया है। तब मेघनाद आगे बढ़कर पिता को सांत्वना देते हुए कहता है कि किसी योद्धा से मारे जाने से देश नहीं हारता। छोटा पुत्र अतिकाय भी कहता है कि उनके पिता के रहते हुए लंका अपराजेय है। एक अन्य पुत्र देवांतक कहता है कि वो राम को मारकर रामांतक कहलाना चाहता है। रावण और उसकी छोटी रानी धन्यमालिनी के चार पुत्र अतिकाय, देवांतक, नरांतक और त्रिशिरा युद्ध में जाने की आज्ञा लेते हैं। उधर युद्धभूमि में विभीषण शोकग्रस्त हैं। वह स्वयं को भाई कुम्भकरण की मृत्यु का दोषी मानते हैं। राम उन्हें जीवात्मा के नश्वर होने और शोक त्यागने का उपदेश देते हैं। राम कुम्भकरण की मौत को वीरगति का गौरव देते हैं। अशोक वाटिका में त्रिजटा सीता को कुम्भकरण के मारे जाने का समाचार देती है। सीता प्रसन्न होती हैं लेकिन रावण के चार पुत्रों के एक साथ युद्ध में जाने की सूचना पर वे माता जगदम्बा से सदा अपने पति राम के दाहिने रहने की प्रार्थना करती हैं। रणभेरी बजती है। अतिकाय अपना दूत राम के पास भेजकर कहलाता है कि जिस प्रकार उनके पिता अपने भाई की मौत पर शोकग्रस्त है, उसी प्रकार वो लक्ष्मण को मारकर राम को भ्रातशोक देना चाहता है। राम लक्ष्मण को युद्ध के लिये भेजते हैं। विभीषण लक्ष्मण को सचेत करते हैं कि अतिकाय कुम्भकरण से सवाया बड़ा लड़ाका है। वह बताते हैं कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधित होकर अतिकाय पर अपने त्रिशूल से प्रहार किया था लेकिन उसने त्रिशूल तोड़कर शिवजी का मान भंग कर दिया। इससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उसे धनुर्विद्या के तमाम रहस्य सिखाए थे। विभीषण एक और प्रसंग सुनाते हैं। आदिकाल में मधु और कैटभ नामक दो असुरों ने बैकुण्ठ में घुसकर क्षीरसागर पर चढ़ाई कर दी। भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र भी दोनों असुरों का कुछ नहीं बिगाड़ पाया। अहंकार में आकर मधु कैटभ ने विष्णु से वरदान माँगने को कहा। भगवान विष्णु ने वरदान में मधु और कैटभ से उनकी मृत्यु का उपाय पूछ लिया। मधु कैटभ ने दम्भ में आकर कहा कि वे उनके जाँघ पर ही मरेंगे। तब भगवान विष्णु ने अपना आकार बड़ा करके अपनी जाँघों के बीच दोनों असुरों को फँसाकर मार डाला। वही पराक्रमी मधु इस जन्म में कुम्भकरण बन कर पैदा हुआ और ब्रह्मा से अभेद्य कवच पाने वाला ही अतिकाय है। इस पर राम कहते हैं कि विभीषण लक्ष्मण के असली स्वरूप को नहीं जानते हैं, इसलिये वे उनको रोक रहे हैं। लक्ष्मण बड़े भाई राम की प्रदक्षिणा करके रणभूमि में जाते हैं। लक्ष्मण और अतिकाय के बीच ललकारपूर्ण संवाद होता है। उधर अंगद अपनी गदा प्रहारों से नरांतक और हनुमान देवांतक का अन्त कर देते हैं।
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