EP 88 || KATHOPANISHAD || प्रथम अध्याय, प्रथम वल्ली(मंत्र-8)|| PART - 13|| ISHADI NAU UPANISHADS
Автор: GAYATRI SHAKTIPEETH SAHARSA
Загружено: 2026-03-17
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कठोपनिषद, कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा का एक ऐसा उपनिषद है जो उपनिषद ज्ञान का मुकुटमणि है । इसका मुख्य आकर्षण है यम नचिकेता संवाद जिसमें एक तरफ है जिज्ञासु शिष्य और दूसरी तरफ हैं ब्रह्मज्ञानी गुरु । गुरु की अनेकानेक परीक्षाओं में जब वह खड़ा उतरता है तब वे उसे सुर दुर्लभ ज्ञान आत्मज्ञान यानि ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं। इस ब्रह्मविद्या के विषय में नचिकेता ने यमराज से कैसे पूछा क्या पूछा और यमराज ने उसे किस प्रकार से बताया इसी का खूबसूरत विवेचन कठोपनिषद है। इसमें आत्मा परमात्मा, ब्रह्म परब्रह्म, इंद्रिय, मन, बुद्धि, स्वर्गदायिनी अग्नि विद्या का वर्णन तो है ही इनके अलावा, इसमें दो मार्गों की विशेष चर्चा की गई है - प्रवृत्ति अर्थात प्रेय मार्ग निवृत्ति अर्थात श्रेय मार्ग । इन दो मार्गों में से किसी एक मार्ग के विवेकपूर्ण चयन की बात यमराज बताते हैं। प्रवृत्ति का मार्ग है आसक्ति, आकर्षण और बंधन का मार्ग जिसका आरंभ प्रिय और अंत विषमय होता है और निवृत्ति का मार्ग है विवेक, वैराग्य और मुक्ति का मार्ग जिसका आरंभ विषमय परन्तु अंत अमृतमय होता है। यमराज ने यह भी कहा है कि इन्द्रियों से परे विषय, विषयों से परे मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से परे आत्मा है। जो एकाग्रचित्त होकर मन रूप घोड़े की लगाम एक अच्छे सारथि की तरह थामे रहता है वह उस परम पद को प्राप्त करता है जिसे पाकर कोई पुनः वापस नहीं आता । तो निः श्रेयस मार्ग ही श्रेष्ठ है, सर्वोच्च है क्योंकि यही परम पद का रास्ता है, राजमार्ग है, स्वर्णिम पथ है। तो आइए सुनें हम भाव से, श्रद्धा से, विश्वास से कठोपनिषद के ज्ञान सूर्य की ज्ञान किरणों का वाचन अनुभवी मार्गदर्शक डॉ अरुण कुमार जायसवाल से और बढ़ चलें स्वयं भी सनातन ज्ञान के सनातन पथ पर ।
धन्यवाद !!
डॉ अरुण कुमार जायसवाल ||
गायत्री शक्तिपीठ सहरसा , बिहार ||
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