स्वतन्त्रता सेनानी क्रांति वीर शहीद शीतल पाल बिरहा सन 1857 👈👈👈🙏🙏🙏🌹🌹
Автор: Rahul pal pali
Загружено: 2024-04-29
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स्वतन्त्रता सेनानी क्रांति वीर शहीद शीतल पाल
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👉शहीद शीतल पाल (जिवन परीचय)👈
सन् सत्तावन का शहीद योद्धा शीतल पाल
बड़े-बड़े नामचीनों की भीड़ में छोटे-छोटे लोग गुमनाम हो जाया करते हैं। ऐसा ही हुआ है तत्कालीन काशी प्रांत में भदोही के निकट पाली गॉंव निवासी शहीद शीतल पाल के साथ। शीतल का जन्म पाली गॉंव के निहायत ही निर्धन गड़ेरिया परिवार में हुआ था। सन् सत्तावन में अंग्रेजों के विरुद्ध हुए यहॉं-वहॉं बिखरे विद्रोह के दौरान लोगों पर ज़ुल्म ढा रहे अंग्रेज कलेक्टर की गर्दन काटकर फॉंसी के फंदे को चूम लेने वाले शहीद शीतल पाल का भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में कहीं नाम नहीं।
भारत भर में यत्र-तत्र हुए विद्रोह की कड़ी में एक विद्रोह वाराणसी से सटे हुए भदोही के निकट पाली गॉंव में भी हुआ था। उन दिनों नील की खेती भारी पैमाने पर अंग्रेजों द्वारा जबरन करवाई जाती थी। अंग्रेज खेतिहर मजदूरों को अमानवीय यातनाएं देते थे। पाली में ही नील का भारी गोदाम था और वहीं पर था कलेक्ट्रेट हेड क्वार्टर। कलेक्टर रिचर्ड म्योर के आतंक से इलाके में खलबली मची हुई थी। अंग्रेजों द्वारा लोगों से बेगारी करवाना, काम कर रहे लोगों पर कोड़े बरसाना, मनपसंद चीजों को छीन लेना गॉंव की भोली-भाली युवतियों से जबर्दस्ती करना आम बात थी। उस इलाके का जमींदार उदवंत सिंह अंग्रेजों के खिलाफ आस-पास के गॉंव के पहलवान और लड़ाकू लड़कों को उकसाकर गिरोह बनाने में सक्रिय हो गया था। युवा पहलवान शीतल पाल भी उस गिरोह का हिस्सा था। लोगों को उकसाने और गिरोह बनाने की प्रक्रिया अत्यंत गोपनीय थी किंतु गॉंव के गद्दार मुखबिरों से म्योर को खबर मिल गई। लोगों के बगावती तेवर से अंग्रेज आग बबूला हो गये। कलेक्टर ने एक षड्यंत्र के तहत परऊपुर निवासी उदवंत सिंह को बातचीत के लिए बुलवाया और पेड़ पर फॉंसी से लटका दिया। उदवंत की पत्नी रत्ना ने देवर झूरी से अपने पति के हत्यारे का सिर मॉंगा। उदवंत की फॉंसी से इलाके में खौफ के बजाय गुस्से की आग भभकने लगी। लोगों में अंग्रेजों से बदला लेने की भावना घर कर गई। क्या अमीर क्या गरीब, क्या बूढ़ा क्या जवान, सबका खून खौलने लगा।
पाली गॉंव के निवासी जगदेव पाल और रमदेई का इकलौता बेटा था शीतल। शीतल पाल की भी शादी हो चुकी थी और बलवीर नामक नन्हा बेटा भी था। शीतल पाल भी इलाके के उन नौजवानों में से एक था जो अंग्रजों से खार खाए हुए थे और बदला लेने की तलाश में थे। इस बीच एक दिन युवक शीतल पाल की मॉं भेड़-बकरियों को चरा रही थीं और उधर से कुछ अंग्रेज गुजर रहे थे। मांसभक्षी अंग्रजों के मन में लालच आई और दो बकरे उठाकर चलते बने। इस घटना ने पहले से ही गुस्साए शीतल पाल के लिए आग में घी का काम किया। इस बात की खबर मिलते ही झूरी सिंह ने शीतल को अपने घर बुलाया और अंग्रेजों के विरुद्ध शीतल के अंदर सुलग रही क्रोध की चिंगारी को शोला बना दिया। अगले दिन नौजवान शीतल अपनी मॉं को घर पर रोक दिया और स्वयं ही मवेशियों को चराने के लिए उधर ही ले गया जिधर अंग्रेज अफसर का ठिकाना था। उधर झूरी सिंह अपने भाई की फॉंसी का बदला लेने के लिए कुछ नौजवानों को साथ लेकर जेम्स म्योर की हवेली पर धावा बोल दिया। इस अप्रत्याशित हमले से म्योर बिल्कुल घबड़ा गया और हड़बड़ी में घोड़े पर सवार होकर उधर ही भागा जिधर अतुल्य साहसी शीतल पाल अपनी भेड़ों के बीच घात लगाए बैठा था। अंग्रेज अफसर को भागते आता देख शीतल पाल का हौसला दूना हो गया। ज्योंही म्योर का घोड़ा पास में पहुॅंचा, बिना अवसर गॅंवाये युवक शीतल पाल ने फुर्ती से अपने साकले (लग्घी में लगा तेज धारदार हॅंसिया जिससे पेड़ों की पतली डालियॉं काटी जाती हैं) को म्योर की गर्दन में फॅंसाकर नीचे गिरा दिया और अपनी कुल्हाड़ी द्वारा अधकटी गरदन से छटपटाते हुए उस क्रूर अफसर का सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया। तब तक पीछा कर रहा झूरी सिंह भी आ पहुॅंचा और सिर लेकर अपनी भाभी को दे अपना प्रण पूरा किया।
इस प्रकार अत्याचार के खिलाफ मन में उठे आक्रोश और अदम्य साहस से शीतल पाल ने एक अंग्रेज आततायी का अंत तो कर दिया लेकिन शीतल पाल के परिवार पर शामत आ गई। पूरा परिवार बिखर गया। कोई कहीं तो कोई कहीं का प्रवासी हो गया। रह गई घर में बूढ़ी मॉं जिससे अंग्रेज सिपाही रोज पूछताछ करते और मारते पीटते ताकि वे शीतल को पकड़ सकें। शीतल पाल की खोज में अंग्रेजों ने आस-पास के कई गॉंवों में आग लगा दी। भले ही शीतल साहसी और निर्भीक था पर मॉं की ममता उसका पीछा नहीं छोड़ती थी। एक रात वह बूढ़ी मॉं से मिलने अपनी मड़ई में आ ही गया। गॉंव के ही गद्दार खबरी ने इसकी सूचना अंग्रेजों को दे दी। ऑंखों में ऑंसू लिए मॉं अपने हाथों से शीतल को खाने का दो ही निवाला खिला पाई थी कि अंग्रेज सिपाहियों का एक भारी जत्था आ धमका। भारत मॉं का वह साहसी सपूत शीतल पाल गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया।
अंग्रेज अफसर जेम्स रिचर्ड म्योर की हत्या के आरोप में 23 मार्च 1958 ई. को गोपीगंज स्थित मिर्जापुर तिराहे पर इमली के पेड़ से वीर शीतल पाल को फॉंसी पर लटका दिया गया और पाली का लाल शीतल पाल शहीद होकर अमर हो गया। शीतल का बलिदान संसार को संदेश दे गया कि …..
अदम्य साहसी शीतल पाल का बलिदान आजतक यथोचित सम्मान के लिए मोहताज है। उनकी स्मृति में उनके वंशज राम सहारे पाल पाली में ‘शहीद शीतल पाल विद्यालय’ नाम से व्यक्तिगत शिक्षण संस्थान चला रहे हैं। पाली के लोगों की विशेष मॉंग पर सन् 2012 ई. में जिला हेडक्वार्टर ज्ञानपुर में स्थापित शहीद शीतल पाल की एकमात्र प्रतिमा पाली के बलिदानी माटी की पहचान है।
राहुल पाल
ग्राम - पाली
पोस्ट- पाली
जिला-भदोही
उत्तर-प्रदेश
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