Bhojpuri Actor Kunal Singh ka Filmy Safar .
Автор: Suburban Times
Загружено: 2022-11-21
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Bhojpuri Actor Kunal Singh ka Filmy Safar .
#BhojpuriStar #KunalSingh: साल 1983 में 'गंगा किनारे मोरा गांव' नाम से आई फिल्म ने तो इतिहास रच दिया था। यह फिल्म वाराणसी के एक थियेटर में लगातार 1 साल 4 महीने तक चली थी। यह भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में आज भी एक रेकॉर्ड है। फिल्म में हीरो थे कुणाल सिंह। वही कुणाल सिंह जिन्हें भोजपुरी फिल्मों का अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) भी कहा जाता है। 1977 में फिल्म में हीरो बनने के लिए कुणाल सिंह मुंबई पहुंचे थे। उन दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं, 'वह जवानी के दिन थे। मैंने तय कर लिया था कि हीरो ही बनना है। मेरे पिताजी (बुद्धदेव सिंह) विधायक थे और बाद में काफी दिन तक मंत्री भी रहे। इसके बावजूद उन्होंने कुछ दिन बाद पैसा भेजना बंद कर दिया। उन्हें मेरे भविष्य की चिंता थी और मैं समझा कि मैं उन पर बोझ बन गया हूं। मैंने भी कह दिया कि अब मैं नौकरी कर रहा हूं और अपना खर्च खुद चला लूंगा।' यह संयोग ही है कि भोजपुरी के अमिताभ और असली अमिताभ एक साथ फिल्म भी कर चुके हैं। फिल्म का नाम था गंगोत्री। फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। कुणाल सिंह करीब 4 दशक से भोजपुरी फिल्मों में काम कर रहे हैं। कुणाल ने अब तक 273 फिल्मों में काम किया है। भोजपुरी फिल्मों में योगदान के लिए साल 2012 में उन्हें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों राष्ट्रकवि दिनकर अवार्ड से भी नवाजा गया था। कुणाल के पिता बिहार में विधायक थे और बाद में मंत्री भी बने थे। हालांकि कुणाल शुरू से ही एक्टर बनना चाहते थे। अपने सपनों में रंग भरने कुणाल ने बिहार से मुंबई का रुख कर लिया। हालांकि जिस बिहार को छोड़ वह मुंबई गए थे उसी बिहार में वो आज अमिताभ बच्चन के नाम से मशहूर हैं। कुणाल राजनीति में भी हाथ आजमा चुके हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पटना साहिब से चुनाव लड़ा था और दूसरे स्थान पर रहे थे। कुणाल सिंह का कहना है कि भोजपुरी फिल्मों में अपनी जगह सुपरस्टार रवि किशन को लेते देखना चाहते हैं।
'मुंबई में रहने के लिए पिताजी से बोला था झूठ' कुणाल आगे याद करते हैं, 'पिताजी से तो झूठ बोल दिया लेकिन उसके बाद संघर्ष के दिन बहुत मुश्किल लग रहे थे। खैर, ईमानदारी से संघर्ष में जुटा रहा। फिर वह दिन भी आया जब मेरे हाथ एक फिल्म लगी 'कल हमारा है'। वैसे तो यह हिंदी फिल्म थी लेकिन इसकी कहानी बिहार के परिवेश पर थी और इसमें एक भोजपुरी बोलने वाला कलाकार चाहिए था। यह फिल्म पटना में करीब 37 हफ्ते तक चली और मैं हिंदी फिल्म से भोजपुरी का स्टार बन गया था। 'फिल्म हिट हुई और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा'
सिंह बताते हैं, 'इसके बाद तो भोजपुरी निर्माताओं की लाइन लग गई। मेरे पास भी काम नहीं था। तो मैंने भी फिल्म साइन करनी शुरू कर दी। पर, यह ख्याल रखा कि कभी ऐसी फिल्म न करूं जिससे खुद की नजर में ही गिर जाऊं। आज 40 साल हो गए इंडस्ट्री में लेकिन कोई मुझ पर सवाल नहीं उठा सकता, इस बात का गर्व भी है। इस फिल्म के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।'
'भोजपुरी सिनेमा से अश्लीलता का दौर भी खत्म होगा'
भोजपुरी में अश्लीलता के सवाल पर कुणाल कहते हैं, 'यह दौर भी जाएगा। कोई दौर स्थाई नहीं होता। हमने 270 से अधिक फिल्में कीं लेकिन पुरानी फिल्में उठाकर देखिए आपको बार-बार उसे देखने का मन होगा। वजह यह कि वह पूरे परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं। पर, आज की फिल्में या गाने हम सभी परिवार के साथ ना देख सकते हैं, ना सुन सकते हैं। पर, यह दौर भी जाएगा। पुराना सुनहरा दौर वापस आएगा। भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में ही यह है।'
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