मैं भी कैसा तुर्फ़ा,कोहरों में , चेहरों को ढूँढता हूं ! रचना-एल पी शर्मा "लक्ष्य" जयपुर राज
Автор: Lakshya
Загружено: 2026-02-17
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ग़ज़ल !
मैं भी कैसा तुर्फ़ा, कोहरों में , चेहरों को ढूँढ़ता हूं !
मैं भी कैसा तुर्फ़ा, कोहरों में , चेहरों को ढूँढ़ता हूं ,
एक शहर ए अजनबी में , अपनों को ढूँढ़ता हूं !
जुदाई का जख्म , दर्द ए जिंदगी का नासूर बड़ा ,
मैं बेचैन पशेमां , हकीम लुकमान को ढूँढ़ता हूं !!
मैं भी कैसा तुर्फ़ा, कोहरों में , चेहरों को ढूँढ़ता हूं ,
एक शहर ए अजनबी में , अपनों को ढूँढ़ता हूं !
वो जो ना मिल पाये मुझको , मेरे ही अपनों में ,
मैं अब उस रूह-अफजा को , ग़ैरों में ढूँढ़ता हूं !
वो हकीकत में नही , मेरे ख्वाबे हसरत में मौजूद ,
जहां भी तशरीफ उसकी , उस खेमे को ढूँढ़ता हूं !!
मैं भी कैसा तुर्फ़ा, कोहरों में , चेहरों को ढूँढ़ता हूं
एक शहर ए अजनबी में , अपनों को ढूँढ़ता हूं !
वादा तोड़ना नही , चलन इश्क ए तिजारत में ,
रुह से, रुह, जो बांधे , उस चाहत को ढूंढ़ता हूं !
सिर पे, हाथ रख कर , सहलाये कभी आकर ,
ऐसी नेक दिल मूमल को , शिद्दत से ढूँढ़ता हूं !!
मैं भी कैसा तुर्फ़ा, कोहरों में , चेहरों को ढूँढ़ता हूं ,
एक शहर ए अजनबी में , अपनों को ढूँढ़ता हूं !
मैं भी कैसा तुर्फ़ा, कोहरों में , चेहरों को ढूँढ़ता हूं !!
एल पी शर्मा " लक्ष्य "
जयपुर !
राज .
Copyright Disclaimer
लेखक - लक्ष्मी प्रसाद शर्मा “ लक्ष्य “, प्रकाशन वर्ष -
16 फरवरी 2026 , यह सामग्री मूल है कॉपीराइटेड है और अनुमति के बिना अनधिकृत उपयोग वर्जित है !
एल पी शर्मा " लक्ष्य "
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