अंदर के सूर्य को जलाने से ही होती है आत्मज्ञान की प्राप्ति। आचार्य रजनीश (ओशो)
Автор: Osho Amar Hai
Загружено: 2024-10-01
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अंदर के सूर्य को जलाने से आत्मज्ञान की प्राप्ति
ओशो की यह अद्भुत उक्ति "अंदर के सूर्य को जलाने से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है", गहन आध्यात्मिक रहस्य को उजागर करती है। यहां "अंदर का सूर्य" एक रूपक है, जो हमारे भीतर की आंतरिक शक्ति, चेतना और प्रकाश का प्रतीक है। यह आत्मज्ञान के उस अनुभव को संदर्भित करता है, जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।
हमारे भीतर का सूर्य अज्ञानता, भ्रम और बाहरी दुनिया की व्यर्थता से ढका हुआ रहता है। जब हम अपनी चेतना को भीतर की ओर मोड़ते हैं, ध्यान, आत्मनिरीक्षण और साधना के माध्यम से इस आंतरिक प्रकाश को प्रज्वलित करते हैं, तब हमें अपनी आत्मा का अनुभव होता है। यह आत्मज्ञान है, जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व की सत्यता को समझता है, अपनी सीमाओं और भ्रांतियों से मुक्त होता है।
ओशो के विचार में यह प्रक्रिया बाहरी साधनों पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह अंदर की यात्रा है। जब हम अपने भीतर की गहराइयों में उतरते हैं और उस दिव्यता को खोजते हैं, तब हमें आत्मा का ज्ञान प्राप्त होता है, और जीवन में शांति, आनंद और संतुलन की अनुभूति होती है।
इस प्रकार, "अंदर के सूर्य को जलाना" एक प्रतीकात्मक संदेश है, जो हमें हमारी आंतरिक चेतना को जागृत करने और आत्मज्ञान की दिशा में बढ़ने की प्रेरणा देता है।
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