लक्ष्मी जी की प्रसन्नता के लिए सुनो | महिषासुर का अंत | श्री दुर्गा सप्तशती अध्याय 2 | हिंदी पाठ
Автор: SGL bhakti भजन चैनल
Загружено: 2026-02-19
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🙏 जय माँ दुर्गे 🙏
क्या आप जानते हैं महिषासुर का अंत कैसे हुआ?
श्री दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में माँ चण्डिका के भयंकर और दिव्य रूप का वर्णन है, जहाँ अधर्म का विनाश और धर्म की विजय होती है।
यह पाठ सुनने से:
✔ नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं
✔ भय और संकट समाप्त होते हैं
✔ माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है
नवरात्रि विशेष यह दिव्य पाठ अवश्य सुनें और अपने जीवन में शक्ति, साहस और विजय का आशीर्वाद पाएं।
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lyrics =
कमल के आसन बैठी है, प्रसन्न मन से माय । महालक्ष्मी के चरणों में, रही मैं शीश नवाय ।
महिषासुर की मर्दिनी, उनका ध्यान लगाय । हर अक्षर को लिखने में, करियो मेरी सहाय ।।
जिनके कर अक्षमाला सोहे। फरसा, गदा, बाण, मन मोहे ।।
वज्र, पद्म, और धनुष, विराजे । कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, है साजे ।।
खडग, ढाल, की शोभा न्यारी। घण्टा, शंख, धरे महतारी ।।
मधु पात्र और शूल धरानी। पाश, चक्र, कर धरे भवानी ।।
ऐसा ध्यान लगावे कोई। उसी क्षण पाप मुक्त वो होई ।।
दूजे इस अध्याय की, भाषा लिखूं बनाय । लिखो भवानी मात श्री. एक-एक अक्षर आय ।।
पूर्व काल में देवअसुर, लडते थे अधिकाय । हुआ घोर संग्राम तब, सौ वर्षों तक माय ।।
महिषासुर था असुर विधायक । इन्द्र थे सब देवों के नायक ।।
हुआ युद्ध दौनों में भारी। देवों की सेना तब हारी ।
यज्ञ भाग देवों के छीने। स्वर्ग से वन्चित उनको कीन्हे ।।
भये पराजित देवता सारे। फिरते थे वो मारे-मारे ।।
प्रजापति ब्रह्मा ठिंग आये। ब्रह्म को अपनी व्यथा बताये ।।
ब्रह्मा जी को साथ में लेकर चले जहाँ थे भोले शंकर ।
सब देवों ने व्यथा सुनाई। महिषासुर है अति अन्याई ।।
इन्द्र कहे तुम सुनो महेशा । देवा हमरे हरो कलेशा ।।
सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, के, छीन लिये अधिकार । इन्द्र, वरूण, और वायु, को, स्वर्ग से दिया निकार ।।
यम के भी छीने अधिकारा। अन्य देवता को भी निकारा ।।
सब का भोग करे अन्याई। स्वर्ग से सब देवो को भगाई ।।
देव फिरत हैं मानव भांति । धूल में मिली हमारी ख्याति ।।
महिषा की करतूत सुनाई। हम सब तुम्हरी शरण में आई ।।
ऐसा जतन करो तुम कोई । महिषासुर वध होबे जोई ।।
सुनकर वचन विष्णु भगवाना । बहुत क्रोध कीन्हा बलवाना ।।
क्रोध किया है शिव ने भारी। उनकी भौंहैं तन गई सारी ।।
मुख टेढा हो गया विकराला । क्रोध में भर गये भोले भाला ।।
हरि ने क्रोध किया है भारी। शंख, चक्र, और गदा, हैं धारी ।।
मुख से तेज निकल गया भारी। तब प्रकटी वो जग महतारी ।।
ब्रह्मा शंकर इंद्र से, निकला तेज अपार । सब देवों के अंग से, तेज की थी भरमार ।।
सब मिलकर एक जगह समाया । तेज का पुञ्ज वही महामाया ।।
पर्वत सा दीखे विकराला। दसों दिशायें फैली ज्वाला ।।
सब देवों की थी वो शक्ति। जिसकी करते देवता भक्ति ।।
अदभुत दीख रही एक नारी। फैला तेज सबही संसारी ।।
तीनों लोक प्रकाश से दमके। माँ के तेज से सबही चमके ।।
शिव के तेज से मुख प्रकटाया। यम का तेज केशों में समाया ।।
विष्णु तेज भुजाओं में आया। चन्द्र का स्तन तेज समाया ।।
इन्द्र का तेज कमर में आया। वरूण तेज जंघा में समाया ।।
वरूण तेज से पिडली बन गई। नितम्ब भाग पृथ्वी ने बनाई ।।
ब्रह्म तेज चरणों में समाया। सूर्य तेज अगुलियों में पाया ।।
वसुओं का जो तेज था भारी। हाथों की उगलियाँ बनी हैं सारी ।।
कुबेर के तेज से नासिका, प्रजापति से दाँत । तीन नेत्र अग्नि से भये, तब प्रकटी वो माँत ।।
संध्यातेज ने भौंहै बनाई। वायु तेज कानों में पाई ।।
सब देवों की शक्ति माई। एक ही जगह प्रकट हो जाई ।।
प्रसन्न हुये तब देवता भारी । प्रकट भई थी जग महतारी ।।
हाथ जोड करते जय-जयकारा । हरलो माता कष्ट हमारा ।।
महिषासुर ने कष्ट है दीन्हा। स्वर्ग से हमको बाहर कीन्हा ।।
भगवन शंकर पिनाक धारी। शूल से शूल बनायो भारी ।।
शूल दिया है शिव ने भवानी। विष्णु ने चक्र दियौ कल्याणी ।।
वरूण ने शंख भेट में दीन्हा। चरणों में मस्तक रख दीन्हा ।।
अग्नि देव ने शक्ति दी है। शक्ति देकर भक्ति की है ।।
वायु ने धनुष बाण संभलाये । बाण भरे तरकस धरवाये ।।
इन्द्र ने वज्र दिया है भारी। ऐरावत का घण्टा उतारी ।।
यम ने काल दण्ड है दीन्हा। वरुण ने पाश को अर्पण कीन्हा ।।
प्रजापति ने दे दई, स्फटिकाक्ष की माल । ब्रह्माजी ने कमण्डलु, माँ को दे दिया हाल ।।
सूर्य ने मैया के रोम में, तेज भरा है हाल । ढाल और तलवार को, दे रहे झुककर काल ।।
क्षीर समुद्र ने उज्वल हारा। माँ को देकर रूप संवारा ।।
कभी जीर्ण ना होने वाले। दिव्य वस्त्र दो दिये निराले ।।
चूडामणि दो कुण्डल प्यारे । दिव्य कडे अति उज्वल न्यारे ।।
अर्ध चन्द्र की शोभा न्यारी। बाहु को केयुर संवारी ।।
चरणों में है नुपुर सजाये। गले में सुन्दर हंसली पहनाये ।।
सब ही उगलियाँ माँ की सजाई। अगुठी रत्न जडित पहनाई ।।
अत्यन्त निर्मल फरसा को, विश्वकर्मा ले आय । भेट किया जगदम्ब को, चरनन शीश नवाय ।।
अनेक अस्त्र और कवच अवेधा। माँ को देकर कीन्ही सेवा ।।
माँ के वक्ष पर माला सजाई। कमल कभी ना वो कुम्हलाई ।।
कमल का फूल जलधि ने दीन्हा। मस्तक चरणों में रख दीन्हा ।।
हिमाचल की आई वारी। माँ को दे दई सिंह सवारी ।।
भांति भांति के रत्न भी दीन्हे । सब ही समर्पित माँ को कीन्हे ।।
मधु का पात्र कुबेर ने दीन्हा। माँ का थोडा प्यार है लीन्हा ।।
शेषनाग ने नाग का हारा । बहुमूल्य मणियों का प्यारा ।।
अस्त्र शस्त्र आभूषण प्यारे । सब देवों ने दीन्हे न्यारे ।।
कर स्तुति सम्मान कराया। सब देवों ने माँ को मनाया ।।
अट्टहास करने लगी, मैया बारम्बार । गर्जन अधिक भयंकरा, गूंज उठा संसार ।।
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