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Автор: kabir Das Bhajan
Загружено: 2026-01-31
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"सतगुर हम सूं रीझि करि" संत कबीर दास जी का अत्यंत गहन और भावनात्मक भजन/दोहा है। इस अमर वाणी में कबीर जी ने गुरु की कृपा, भक्ति का महत्व और आत्मिक जागरण का संदेश दिया है। वे कहते हैं कि जब सतगुरु साधक पर रीझ जाते हैं, अर्थात प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं, तभी साधक का जीवन सार्थक होता है।
इस भजन का भाव है – "सतगुर हम सूं रीझि करि" अर्थात जब गुरु साधक पर प्रसन्न होते हैं, तो उसे नाम‑स्मरण की शक्ति और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। गुरु की कृपा से ही जीव मोह‑माया के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा से जुड़ता है। कबीर जी हमें यह सिखाते हैं कि केवल गुरु की शरण और सतनाम ही वह मार्ग है जो जीव को सच्ची मुक्ति और आनंद प्रदान करता है।
🌿 भजन/दोहा का आध्यात्मिक संदेश
गुरु की कृपा का महत्व: गुरु की प्रसन्नता ही साधक के जीवन को सार्थक बनाती है।
नाम‑स्मरण की शक्ति: सतनाम ही आत्मा को शुद्ध करता है और परमात्मा से जोड़ता है।
मोह‑माया से मुक्ति: सांसारिक सुख और आडंबर क्षणिक हैं, केवल भक्ति शाश्वत है।
सच्ची साधना: गुरु की शरण और ध्यान ही आत्मा को परमात्मा से जोड़ते हैं।
जीवन का उद्देश्य: आत्मा को परमात्मा से जोड़ना और गुरु की कृपा प्राप्त करना ही साधना का सार है।
🎶 भावनात्मक प्रभाव
यह भजन सुनते समय श्रोता को गहरी आत्मिक जागृति और जीवन के सत्य की अनुभूति होती है। कबीर जी की वाणी हमें यह याद दिलाती है कि गुरु की कृपा ही साधक को सच्चे मार्ग पर ले जाती है। जब गुरु रीझ जाते हैं, तो साधक का जीवन आनंद और शांति से भर जाता है।
🌟 निष्कर्ष
"सतगुर हम सूं रीझि करि" केवल एक भजन नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। कबीर जी की वाणी हमें यह सिखाती है कि गुरु की कृपा ही साधक को सच्चे मार्ग पर ले जाती है। गुरु की शरण और नाम‑स्मरण ही वह मार्ग है जो जीव को सच्ची मुक्ति और शांति प्रदान करता है। यह भजन हर उस व्यक्ति के लिए है जो आत्मिक शांति, भक्ति और सत्य की खोज में है
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