राजा बलि की कहानी | भक्ति, दान और अहंकार का अंत
Автор: Garibdas Tv
Загружено: 2025-12-22
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राजा बलि असुर वंश के महान, पराक्रमी और अत्यंत दानवीर राजा थे। वे प्रह्लाद के पौत्र थे और अपने न्याय, सत्य और दानशीलता के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। राजा बलि ने अपने पराक्रम से स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। उनके राज्य में कोई दुखी नहीं था, प्रजा सुख-शांति से रहती थी और राजा स्वयं को धर्म का पालनकर्ता मानते थे।
देवताओं को जब राजा बलि की बढ़ती शक्ति से भय हुआ, तब उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया—एक छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में—और राजा बलि के यज्ञ में पहुँचे। वामन भगवान ने राजा से दान में केवल तीन पग भूमि माँगी। दानवीर राजा बलि ने बिना किसी संकोच के यह दान स्वीकार कर लिया।
जैसे ही दान स्वीकार हुआ, वामन भगवान ने विराट रूप धारण किया। पहले पग में उन्होंने पूरी पृथ्वी नाप ली, दूसरे पग में स्वर्ग लोक को। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं था। तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया और कहा—“प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रखिए।” भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक भेज दिया, लेकिन उनकी भक्ति और दान से प्रसन्न होकर उन्हें अमरत्व का वरदान दिया और पाताल लोक का राजा बनाया।
राजा बलि की कहानी यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति, दान और विनम्रता के आगे अहंकार टिक नहीं सकता। भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, पर अंत में उन्हें सम्मान और संरक्षण अवश्य देते हैं।
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