भगवद गीता अध्याय 15 | पुरुषोत्तम योग | सर्वोच्च परमात्मा का ज्ञान || Dharma Decode
Автор: Dharma Decode
Загружено: 2025-09-16
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भगवद गीता अध्याय 15, पुरुषोत्तम योग, गीता के सबसे गहन और दिव्य अध्यायों में से एक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण संसार को एक उल्टे अश्वत्थ वृक्ष के रूप में समझाते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर परमात्मा में हैं और शाखाएँ नीचे इस संसार में फैली हुई हैं। यह प्रतीक हमें बताता है कि जीवन की सभी इच्छाएँ, मोह और बंधन अस्थायी हैं, और केवल पुरुषोत्तम—सर्वोच्च परमात्मा—ही शाश्वत सत्य हैं।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा अमर है, वह शरीर बदलती रहती है जैसे हम वस्त्र बदलते हैं। आत्मा क्षर (नश्वर) और अक्षर (अविनाशी) दोनों से परे, पुरुषोत्तम से जुड़ी हुई है। पुरुषोत्तम ही सबका आधार हैं—वही सूर्य की ज्योति हैं, वही चंद्रमा की शीतलता हैं, वही अग्नि का तेज हैं और वही हमारे भीतर पाचन अग्नि के रूप में कार्यरत हैं।
जो साधक इस ज्ञान को समझ लेता है, वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। उसे यह अनुभव हो जाता है कि हर जीव में वही परमात्मा है। तब उसके भीतर से भय समाप्त हो जाता है, मोह मिट जाता है और हर सांस, हर कर्म पूजा बन जाता है। यही पुरुषोत्तम योग की सबसे बड़ी शक्ति है।
इस अध्याय से हमें तीन मुख्य शिक्षाएँ मिलती हैं:
संसार वृक्ष से वैराग्य की तलवार द्वारा मुक्त होना।
आत्मा की अमरता और उसका पुरुषोत्तम से संबंध समझना।
जीवन के हर कार्य को पुरुषोत्तम को समर्पित कर देना।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो साधक पुरुषोत्तम को जान लेता है, वही वास्तव में ज्ञानी है, वही योगी है और वही मुक्त आत्मा है। यह ज्ञान सुनने और जीवन में उतारने से साधक का हर भय समाप्त हो जाता है और उसकी आत्मा परम शांति को प्राप्त करती है।
अगर आप भी यह समझना चाहते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है, मृत्यु का रहस्य क्या है और आत्मा का असली घर कहाँ है, तो यह पुरुषोत्तम योग आपके लिए है।
यह केवल दर्शन नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।
✨ इस वीडियो में आप पाएंगे:
संसार वृक्ष का रहस्य
आत्मा और परमात्मा का गहन संबंध
पुरुषोत्तम का सर्वोच्च स्वरूप
मोक्ष और शांति की प्राप्ति का मार्ग
भगवान श्रीकृष्ण के इन वचनों को केवल सुनें नहीं, इन्हें अपने जीवन में उतारें। जब आप हर कार्य को पुरुषोत्तम को समर्पित कर देंगे, तब आपका जीवन साधना बन जाएगा और मृत्यु भी एक उत्सव।
जय श्रीकृष्ण 🙏
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