दसा माता की कहानी -2 | Dasa Mata Ki Kahani -2 |
Автор: Vrat Katha Dhara
Загружено: 2026-03-04
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दसा माता की कहानी -2
एक राजा के दो रानियां थी। बड़ी रानी के कोई संतान नहीं थी, किन्तु छोटी रानी के एक पुत्र था। राजा छोटी रानी और उसके पुत्र को बहुत प्यार करते थे। यह देखकर बड़ी रानी को ईर्ष्या होती थी। वह राजकुमार के प्राणों की प्यासी हो गयी थी। बड़ी माँ ने उसके गले में काला सांप डाल दिया। वह लड़का दशारानी का दिया हुआ ही था। तो दशारानी की कृपा से लड़के के गले में पड़ा हुआ साँप आप ही सरक कर भाग गया। उसे विष के लड्डू दिये ज्योंही खाने लगा, त्योंही दशारानी ने किसी दासी के वेश में प्रकट होकर लड्डू छीन लिये। बड़ी रानी ने उसे पकड़कर गहरे कुंए में डाल दिया और दशामाता ने उसे बीच में ही रोक लिया। जब दोपहर का समय हुआ और कुँवर कहीं दिखाई न दिया, तब राजा-रानी को बड़ी चिन्ता हुई। जहां-तहां लोग उसकी तलाश करने लगे । राजा-रानी पुत्र शोक में रोने लगे । तब दशामाता एक भिखारणी के वेश में राजकुमार को एक वस्त्र में छिपाये हुए भिक्षा के लिए राजद्वार पर आई। तब सिपाहियों ने दुत्कार कर कहा कि यहां तो राजा का कुमार खो गया है, तुझे भिक्षा की पड़ी है? चल हट यहां से ! तब दशामाता बोली- "भाईयों! पुण्य का प्रभाव बड़ा होता है। यदि मुझे भिक्षा मिल जाय तो संम्भव है कि खोया हुआ राजकुमार भी मिल जाये।" यह कहकर वह देहरी के भीतर पैर रखने लगी। उसी समय दशामाता ने एक वस्त्र में से बालक का पैर उघाड़ दिया। सिपाहियों ने समझा की अभी कुंवर इसके हाथ में है, इसे जाने दो, और कुँवर को भीतर छोड़ आने दो। उधर से बाहर आने लगेगी तब पकड़ कर बिठा लेंगे ।
दशामाता कुँवर को लिये हुए भीतर चली गई। उसने राजकुमार को चौक में छोड़ दिया और वहां से वापस होकर चल दी, परन्तु रानी ने उसे देख लिया था । उसने डांटकर कहा तू कौन है ? तूने तीन दिन से मेरे लड़के को छिपाकर रखा । तुने ऐसा क्यों किया ? दशामाता उसी क्षण ठहर गई। उसने कहा कि रानी। मैं तुम्हारे पुत्र को चुराने-छिपाने वाली नहीं हूँ। मैं ही तेरी आराध्य देवी दशामाता हूँ। तुझे सचेत करने आई हूँ कि तेरी सौत तुझसे ईर्ष्या रखती है। वही तेरे पुत्र को मारना चाहती है। अपने पुत्र को कभी उसके पास न जाने दो और सारा हाल कह सुनाया । माता बोली- मैं तुमको चेतावनी देने आई हूँ। तब रानी भगवती के पैरों पर पर गिर पड़ी। उसने विनीत भाव से प्रार्थना की कि जैसे आपने मेरे पुत्र की रक्षा की वैसे ही मेरे, सुख सौभाग्य की रक्षा करना और मेरे यही आप सदैव रहिये । मुझसे जो सेवा-पूजा बनेगी, सो करूंगी। तब दशामाता ने कहाँ कि मैं किसी के घर में नहीं रहती। जो श्रद्धा पूर्वक मेरा स्मरण करता है, उसी के हृदय में रहती हूँ। मैंने तुझे साक्षात दर्शन दिया इसके उपलक्ष्य में तुम सुहागिनों को न्यौतकर उनको यथाविधि आदर-सत्कार से भोजन कराओ और अपने नगर में तथा राज्य में ढिंढोरा पिटवा दो कि सभी लोग मेरा डोरा लिया करें और व्रत किया करें । यह कह दशामाता अन्तर्ध्यान हो गई। रानी ने शहर भर की सौभाग्यवती स्त्रियों को निमंत्रण देकर बुलाया। उबटन से लेकर शिरोभूषण श्रृंगार तक उनकी यथाविधि सेवा सुश्रूषा करके व गहने आदि देकर आंचल भरे ओर भोजन कराकर विदा किया। शहर और राज्य में भी ढिंढोरा पिटवा दिया कि अब सब लोग दशामाता के डोरा लिया करें ।
📜 Description:
दशा माता की यह पावन कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास से बड़ी से बड़ी विपत्ति भी टल सकती है।
एक राजा की दो रानियों में ईर्ष्या और द्वेष के कारण मासूम राजकुमार के जीवन पर संकट आ जाता है। लेकिन जब सच्चे मन से देवी का स्मरण किया जाता है, तब स्वयं दशा माता उसकी रक्षा के लिए प्रकट होती हैं।
यह कहानी हमें बताती है कि जो भक्त सच्चे हृदय से माता का व्रत और स्मरण करता है, उसके जीवन की सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
इस वीडियो में देखें दशा माता की अद्भुत कृपा और भक्ति की शक्ति की प्रेरणादायक कथा।
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