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धरती का पहला तीर्थ स्थल लोहार्गल धाम दर्शन ~ Lohargal Dham || Part 2 || Sunita Goyal ||

Автор: Sunita Goyal

Загружено: 2021-12-10

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Описание: धरती का पहला तीर्थ स्थल लोहार्गल धाम दर्शन ~ Lohargal Dham || Part 2 || Sunita Goyal ||

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लोहार्गल धाम की महिमा

विष्णु भगवान के 16 अवतारों में सबसे पहला अवतार मत्स्य अवतार यहीं पर हुआ था के चारों ओर 72 किलोमीटर के क्षेत्र मैं समुद्र था और समुद्र का पुत्र शंखासुर असुर योनि में था और भगवान विष्णु की गद्दी हासिल करने के लिए उसने सनातन धर्म की चोरी की थी वेद पुराण उपनिषदों को सनातन धर्म कहा गया है। चोरी करने के बाद शंखासुर समुद्र में छिप गया भगवान विष्णु ने शंखासुर का वध किया और जब शंखासुर भगवान विष्णु के हाथों से मरा तो वह जानकी शरण में चला गया ‌। जब समुद्र में श्री विष्णु भगवान के चरण लगे तो यह जल मित्र हो गया और यहां आने से स्नान करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होने लगी। तब सभी देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने इस जल को ढकने का निश्चय किया समुद्र को ढकने के लिए बहुत बड़ी चीज की आवश्यकता पड़ी तो माल और केतु पर्वत जो सुमेरु पर्वत के दोहे और पोते हैं इन्होंने भगवान की तपस्या की थी तो विष्णु भगवान कोई ने मनोरथ देना था भगवान विष्णु ने इन दोनों को आदेश दिया कि जाकर इस किरोड़ी टपकेश्वर नाग कुंड शोभावती व खोरी कुंड धाराएं निकली। तब फिर से देवताओं ने विष्णु भगवान से प्रार्थना की की महाराज यहां जो भी स्नान करेगा वह मोक्ष को प्राप्त करेगा तब विष्णु भगवान ने बताया कि धाराओं में जो भी स्नान करेगा वह पापों से मुक्ति पाएगा एक समय में इन सातों धाराओं में स्नान करना असंभव है इसीलिए मोक्ष प्राप्त नहीं हो पाएगा। और कहा कि जब कई हजार सालों के बाद जब कलयुग अपनी चरम सीमा पर होगा तब लोग इन धाराओं का स्मरण करेंगे तब तक यह लोप रहेगा। भगवान का धरती पर यहां पर पहला अवतार हुआ इसीलिए इसे धरती का पहला तीर्थ कहा जाता है। इसीलिए इस स्थान का नाम ब्रह्मा क्षेत्र पड़ा। उसके बाद जब धरती पर परशुराम जी का अवतार हुआ तो परशुराम जी ने 21 बार धरती पर है है वंश के क्षत्रियों का नाश किया जब उनका आवेश ठंडा हुआ तो उन्हें एहसास हुआ की मुझे प्रायश्चित करना चाहिए क्योंकि धरती पर आया है उसे यहां किया हुआ भोगना पड़ेगा। भगवान परशुराम ने यहां इस जगह पर यज्ञ करने का निश्चय किया। भगवान परशुराम के द्वारा जो वर्तमान में सूर्य कुंड है उसको यज्ञ कुंड बनाया गया और यज्ञ वेदी में भगवान सूर्य को सप्त निक बुलाया गया क्योंकि श्री सूर्य देव भगवान क्षत्रियों के कुलदेवता भी हैं और नव ग्रहों के प्रधान देवता भी है और इनके बगैर कोई काम संपूर्ण नहीं होता है इनका भी एक में सबसे बड़ा भाग माना जाता है। भगवान सूर्य मां संज्ञा के साथ विराजमान हैं इसीलिए यहां पर श्री सूर्य नारायण भगवान का मंदिर पूर्व में बना हुआ है और पश्चिम में रूद्र भगवान को परशुराम जी ने स्थापित किया। सूर्य भगवान के यहां विराजमान होने के उपरांत इस क्षेत्र का नाम सूर्य क्षेत्र पड़ा। क्षत्रियों का कुलदेवता श्री सूर्य देव भगवान होने के कारण यहां पर अग्रसेन महाराज की पधारे थे। पांडवों के अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने कीचक राक्षस का वध किया था उसके पश्चात पता चला कि पांडव विराटनगर में छुपे हुए हैं उस समय उस दिन के लिए यहां पर पांडव गुफा में छिपे थे इसीलिए यहां पर जो गुफा है उसका नाम भीम गुफा के नाम से जाना जाता है किसी के पास एक कुंड है उसे भीमकुंड के नाम से जाना जाता है पांडवों को अपनी पत्नी को जुए में हारने वह अपने साम्राज्य को जुए में हारने के कारण पाप लगा हुआ था उस पाप से मुक्ति के लिए उन्हें सोमवती अमावस्या का इंतजार था जो उस समय में सोमवती अमावस्या 100 सालों में एक ही बार आती थी लेकिन उनके इंतजार के समय में सोमवती अमावस्या नहीं आई इसलिए यहां से जाते हुए पांडवों ने सोमवती अमावस्या को शापित किया था कि तुम्हारा कलयुग में इंतजार नहीं करना पड़ेगा इसी कारण से अब साल में कई बार सोमवती अमावस्या आ जाती है और यहां से जाने के पश्चात पांडवों ने कौरवों से युद्ध किया। युद्ध जीतने के उपरांत पांडवों ने अपना राज्य काल पूरा किया और जब हिमालय पर्वत से होते हुए स्वर्ग में जा रहे थे उन्होंने बताया कि आप को गोत्र हत्या का पाप लगा है आप पापों के प्रायश्चित के बगैर स्वर्ग में नहीं जा सकते तब पांडवों ने पूछा कि हम इस पापों का प्रायश्चित कैसे कर सकते हैं तब नारद मुनि ने बताया कि आप तीर्थाटन करो तीर्थों पर जाकर के स्नान करो तब पांडवों ने पूछा कि हमें पता कैसे चलेगा कि हमें पापों से मुक्ति मिल गई है तब नारद मुनि ने बताया कि आप जिस भी तीर्थ पर जाकर के स्नान करें साथ में अपने अस्त्र शस्त्रों को भी उसमें धोएं जहां पर आप के अस्त्र शस्त्र द्रुवीभूत हो जाए वही समझ लेना कि आप के पापों से आपको मुक्ति मिल गई है तब पांडवों ने आकर के यहां सूर्य क्षेत्र में स्नान किया और जैसे ही उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र यहां पानी में डालें तो उनके अस्त्र-शस्त्र यहां पर निकल गए अस्त्र-शस्त्र करने के कारण यहां पर इस क्षेत्र का नाम लोहार्गल पड़ा। यहां पर आकर लोग कपड़े दान करते हैं बताया जाता है कि किसी समय में यहां पर द्रोपदी जब द्रुपद राजा की कन्या से पहले जन्म में आई थी तो उसने यहां पर सूर्य भगवान को कपड़े अर्पित किए थे उसका फल उसे दूसरे जन्म में जाकर मिला। यहां पर श्री रामानुज संप्रदाय के मुख्य पीठ है और इसके वर्तमान पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी महंत श्री अवधेश आचार्य जी हैं

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धरती का पहला तीर्थ स्थल लोहार्गल धाम दर्शन ~ Lohargal Dham  || Part 2 || Sunita Goyal ||

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