Vishnu Narayana Stotram | Shri Hari Bhajan | Vishnu Bhakti Songs | Video Edition (Reverb + Slow)
Автор: Vaikunth Dhwani (वैकुंठ ध्वनि)
Загружено: 2024-11-12
Просмотров: 32856
Описание:
The Stotram is sung by
G. Gayatri Devi
R. Shruti
Saindhavi & Priya
Music By - Kosmik Music
Video Edition By - Vaikunth Kathayein
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by - Vaikunth Kathayein
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श्री हरि स्तोत्रम् (Shri Hari Stotram)
श्री हरि स्तोत्रम् में भगवान विष्णु जी की स्तुति की गई है। इसमें विष्णु जी के चतुर्भुज रूप का वर्णन किया गया है। कार्तिक मास में इस स्त्रोत का विशेष महत्त्व रहता है, जो भी साधक इस माह में श्री हरि स्तोत्रम् का पाठ करता है। उसे भगवान विष्णु जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह स्त्रोत बहुत ही शक्तिशाली है। इस स्त्रोत का पाठ करने से साधक की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं। इस स्त्रोत का पाठ पूर्ण श्रद्धाभाव से करने पर मनुष्य को वैकुण्ठ लोक प्राप्त होता है। वह मनुष्य दुख,शोक,जन्म-मरण के बंधन से भी मुक्त हो जाता है।
श्री हरि स्तोत्रम् का महत्व (Importance of Shri Hari Stotram)
भगवान विष्णु जी को प्रसन्न करने के लिए यह स्त्रोत बहुत ही चमत्कारी होता है। इस स्त्रोत का पाठ करने से भगवान विष्णु भक्त की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते है। इस स्त्रोत का पाठ करने से भगवान विष्णु जी के साथ साथ माता लक्ष्मी जी की कृपा भी प्राप्त होती है। श्री हरी स्तोत्र का पाठ करने से पूर्व कुछ नियमों का पालन करना भी जरुरी होता है जिसमे सबसे पहले प्रातः काल उठकर नित्य कर्म के बाद स्नान कर स्वच्छ वस्त्रो को धारण करना चाहिए। इसके बाद पाठ शुरू करने से पहले श्री गणेश जी का नाम लेकर पाठ शुरू करना चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखे जब भी पाठ करें तो उसके बीच में उठना नहीं चाहिए। पाठ के पूर्ण होने पर ही आप उठ सकते है। तभी आपको इसका सकारात्मक फल मिल सकता है।
स्तोत्रम:
जगज्जालपालं कचतकण्ठमालं, शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालम् नभोनीलकायं दुरावारमायं, सुपद्मासहायं भजेहं भजेहम् ।।1
सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं जगत्संनिवासं शतादित्यभासम् गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं हसच्चारुवक्रं भजेहं भजेहम् ।।2
रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं जलांतर्विहारं धराभारहारम् दानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं धृतानेकरूपं भजेहं भजेहम् ।।3
जराजन्महीनं परानंदपीनं समाधानलीनं सदैवानवीनं जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं त्रिलोकैकसेतुं भजेहं भजेहम् ।।4
कृताम्नायगानं खगाधीशयानं विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानम् स्वभक्तानुकूलं जगद्दृक्षमूलं निरस्तार्तशूलं भजेहं भजेहम् ।।5
समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं जगद्विम्बलेशं ह्रदाकाशदेशम् सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं सुवैकुंठगेहं भजेहं भजेहम् ।।6
सुरालीबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं गुरुणां गरिष्ठं स्वरुपैकनिष्ठम् सदा युद्धधीरं महावीरवीरं भवांभोधितीरं भजेहं भजेहम् ।।7
रमावामभागं तलानग्ननागं कृताधीनयागं गतारागरागम् मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं गुणौघैरतीतं भजेहं भजेहम् ।।8
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