पूजन रहस्य | Pujan Rahasya | ब्र. श्री रवीन्द्रजी 'आत्मन्'
Автор: Divyansh Jain Bhajan
Загружено: 2025-03-22
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अशुभ-उपयोग को छोड़कर शुभ-उपयोग का अवलम्बन लेकर शुद्धोपयोग की प्राप्ति में वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु का गुण स्तवन प्रबल निमित्त है। हमें परिणामों की निर्मलता, भेद-विज्ञान और शुद्धात्मानुभूति की प्राप्ति के लिए देव शास्त्र गुरु की भक्ति, स्तुति, पूजन आदि का आलंबन लेना श्रेयस्कर है।
स्याद्वाद शैली के धनी श्रद्धेय आदरणीय बाल ब्र. रवीन्द्र जी 'आत्मन्' जिनकी रचनाओं में स्वांतः - सुखाय चिंतन और सहज, सरल शैली में लेखन जिसमें कामना या रिझाने के लिए कुछ भी न होकर मात्र "जिनवर गुणगान" ही है।
आइए, आदरणीय पंडितजी साहब द्वारा रचित इस अद्भुत “पूजन रहस्य” का आनंद लें।
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(स्थापना)
स्वयं सिद्ध परमात्मा, ज्ञान मात्र सुखधाम।
जाननहार जनाय है, सदा पूर्ण विश्राम।।
देव-शास्त्र-गुरु धर्म अरु, तीर्थ महा सर्वस्व।
देखनहार दिखाय इक, शून्य हुआ सब विश्व।।
(जल)
ज्ञान-द्रह का नीर ज्ञानमय, ज्ञान मांहिं प्रगटावे।
प्रतिमा सम्मुख खड़े हुए भी, जाननहार जानवे।।
जाननहार प्रभु है मेरा, जाननहार ही मैं हूँ।
जन्म-जरा-मृत नहीं दीखता, अविनाशी ज्ञायक हूँ।।
(चन्दन)
अमल ज्ञान की शीतलता में, नहीं संताप दिखावे।
चन्दन से व्यतिरेक दिखाता, निज में तृप्ति पावे।।
अहो! प्रभु ज्ञायकमय अनुपम, परम तृप्ति का सागर।
चिदानन्दमय सहजानन्दमय, आतम हुआ उजागर।।
(अक्षत)
किसकी पूजा, कैसी पूजा ? नहीं समझ में आवे।
अक्षय पूज्यपना मेरा ही, आज मुझे दिखलावे।।
परमपूज्य में लीन परिणति, स्वयं पूज्य हो जावे।
क्षत-विक्षत का काम नहीं कुछ, अक्षत पद प्रगटावे।।
(पुष्प)
पूर्ण तत्त्व निष्काम निहारा, कैसे काम जानवे?
परम ब्रह्म का आश्रय पाकर, परम शील प्रकटावे।।
श्रद्धा का श्रद्धेय मिला, अब ध्येय ध्यान का पाया।
निज ही में आनद मग्न हो, सर्व विकल्प नशाया।।
(नैवेद्य)
वीर्य अनंत उछलता अंतर, क्यों आहार करावे?
अपना अंश ना बाहर जावे, पर से कुछ नहीं आवे।।
ऐसा जाननहार परम प्रभु, आज तृप्ति उपजाई।
मैं अतृप्त भूखा हूँ, मिथ्या भ्रान्ति आज नशाई।।
(दीप)
शाश्वत आलोकित मम गृह में, तम प्रवेश नहीं पावे।
है त्रिकाल निर्मोही आतम, कैसे मोह नशावे?
ज्ञानमात्र सामान्य आतमा, जाननहार जनया।
अहो! आज प्रत्यक्ष लखाया, सर्व विमोह पलाया।।
(धूप)
बिनमूरति, चिन्मूरति आतम, गंधमात्र से रीता।
है निष्कर्म सदा ही चेतन, निज में निजरस पीता।।
मुझको कुछ भी नहीं प्रयोजन, कर्म रहें या जावें।
निश्चय जले कर्म संयोगी, निज को ध्येय बनावें।।
(फल)
निष्फल पूर्ण परम ज्ञायक प्रभु, मोही नहीं स्वीकारे।
फल की चाह-दाह में जलते, क्लेश नहीं निरवारे।।
सहज-मुक्त दृष्टि में आया, मुक्ति-विकल्प न आवे।
सहज-मुक्त में लीन परिणति, सहज मुक्त हो जावे।।
(अर्घ्य)
है अनर्घ शाश्वत प्रभु आतम, आदि अन्त नहीं पाया।
अखिल विश्व भी ज्ञानमात्र की, एक झलक में आया।।
निज में लीन परिणति भी, अब निज ही मांहि समाई।
नहीं दीखता कुछ भी, देता देखनहार दिखाई।।
(जयमाला सार)
नहीं चाहिये सम्यग्दर्शन, मैं श्रद्धेय स्वरूप हूँ।
नहीं चाहिये सम्यग्ज्ञान, सुज्ञानघन चिद्रूप हूँ।।
नहीं चाहिये सम्यक्चारित्र, राग-रहित त्रिकाल हूँ।
सुख भी मुझको नहीं चाहिये, परम तृप्त निहाल हूँ।।
शक्ति कुछ भी नहीं चाहिये, अनंत वीरजवान हूँ।
प्रभुता की दरकार नहीं है, अहो! स्वयं भगवान हूँ।।
अब प्रकाश की नहीं जरूरत, मैं प्रकाशमय हूँ सदा।
नहीं चाहिये मुझे स्वच्छता, सहज स्वच्छ ही हूँ सदा।।
सिद्ध दशा भी नहीं चाहिये, स्वयं सिद्ध गुणधाम हूँ।
हूँ एकांत शांतमय चिन्मय, अद्भुत आतम राम हूँ।।
करना मुझको ध्यान नहीं, जब परम ध्येय मैं आप हूँ।
शक्ति अनन्त उछलती निर्मल, मंगलमय निष्पाप हूँ।।
आराधना की नहीं कामना, मैं ही तो आराध्य हूँ।
साधन-साध्य विकल्प नहीं हैं, पूर्ण स्वयं ही साध्य हूँ।।
करने को अवकाश न कुछ भी, मैं तो पूर्ण कृतार्थ हूँ।
बंधन-मुक्त दशा नहीं मुझको, सहज मुक्त मैं आप हूँ।।
पर्यायों की ओर लखे से, अनुभूति दुर्लभ होती।
ज्ञेयों का बहुमान किये से, रागमयी परिणति होती।।
निज का ही श्रद्धान-ज्ञान, संवर-निर्जरा प्रगटाता है।
निज स्वभाव में पूर्ण रमणता, परम मुक्तिपद-दाता है।।
अखिल विश्व में निज-ही-निज है, निजमय मेरा लोक है।
मोह-अंधेरा भाग चुका है, फैला ज्ञानालोक है।
कहूँ कहाँ तक? क्यों? कैसे? मैं अब विराम ही लेता हूँ।
निज में ही आनंदित हूँ, अंतर निजरस ही पीता हूँ।।
(दोहा)
ज्ञाता सहजानंदमय, अकृत्रिम भगवान।
नित्य निरंजन ज्ञानमय, एक ज्ञायक अम्लान।।
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Lyrics - Baal Br. Shree Ravindra Ji ‘Aatman’
Singer – Divyansh Jain
Music – Divyansh Jain
Arranged & Produced by – Kunal Soni
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Chapters:
00:00 स्थापना छंद
01:02 जल छंद
01:52 चंदन छंद
02:43 अक्षत छंद
03:34 पुष्प छंद
04:25 नैवेद्य छंद
05:15 दीप छंद
06:06 धूप छंद
06:57 फल छंद
07:48 अर्घ छंद
08:33 जयमाला
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