[Mankiw principles of economics 17] 17. एकाधिकारिक_प्रतिस्पर्धा
Автор: UPSC economist
Загружено: 2025-10-04
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यह वीडियो एकाधिकारिक प्रतिस्पर्धा यानी मोनोपोलिस्टिक कंपटीशन के बारे में है, उस बाज़ार के बारे में जहाँ हमें चुनने के लिए बहुत कुछ मिलता है। यह इस पसंद की असली कीमत को समझने पर केंद्रित है।
1. बाज़ार का स्पेक्ट्रम और एकाधिकारिक प्रतिस्पर्धा
बाज़ार को एक स्पेक्ट्रम की तरह देखा जा सकता है: एक तरफ पूर्ण प्रतिस्पर्धा जहाँ सब कुछ एक जैसा है, और दूसरी तरफ एकाधिकार जहाँ सिर्फ एक खिलाड़ी का राज चलता है।
ज़्यादातर वास्तविक बाज़ार, जैसे रेस्टोरेंट और कपड़ों की दुकानें, इन दोनों के बीच में आते हैं, जिसे एकाधिकारिक प्रतिस्पर्धा कहते हैं。
एकाधिकारिक प्रतिस्पर्धा के गुण:
कई कंपनियाँ: जबरदस्त प्रतिस्पर्धा होती है।
विभेदित उत्पाद: हर कंपनी कुछ अलग बेचती है, जैसे बर्गर किंग और मैकडॉनल्ड्स।
फ्री एंट्री: कोई भी नया व्यवसाय आसानी से बाज़ार में आ सकता है।
शून्य आर्थिक लाभ: लंबे समय में प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ जाती है कि कोई भी कंपनी मोटा आर्थिक मुनाफा नहीं कमा पाती।
2. अल्पकाल में लाभ और दीर्घकाल में लाभ का गायब होना
अल्पकाल में लाभ: कंपनियाँ अल्पकाल में मुनाफा कमाती हैं जब सीमांत लागत एक और चीज़ बनाने की लागत, उसे बेचने से होने वाली सीमांत राजस्व अतिरिक्त कमाई के बराबर हो जाए। मुनाफ़ा तभी होगा जब बेचने की कीमत औसत कुल लागत से ज़्यादा हो।
दीर्घकाल में लाभ का गायब होना: अल्पकाल में होने वाला लाभ एक चुंबक की तरह काम करता है, जो नई कंपनियों को बाज़ार में आकर्षित करता है। जैसे ही नई कंपनियाँ आती हैं, ग्राहकों की संख्या और मांग कम हो जाती है, जिससे बिक्री घटती है और मुनाफा भी कम हो जाता है, जब तक कि आर्थिक मुनाफा घटकर शून्य न हो जाए।
3. एकाधिकारिक प्रतिस्पर्धा के साइड इफेक्ट्स
मार्कअप: कंपनियाँ चीज़ को बनाने की असली लागत से ज़्यादा कीमत वसूलती हैं। यह समाज के लिए एक तरह का नुकसान है।
अतिरिक्त क्षमता (Excess Capacity): रेस्टोरेंट जैसे व्यवसाय अक्सर आधे खाली होते हैं और अधिक ग्राहकों को सेवा दे सकते थे, जिससे उनकी प्रति यूनिट लागत कम हो जाती। यह एक तरह की अक्षमता है।
4. विज्ञापन: एक बड़ी बहस
विज्ञापन का उद्देश्य: कंपनियाँ शून्य लाभ के जाल से बचने और अपने उत्पादों को अलग दिखाने के लिए विज्ञापन का उपयोग करती हैं।
विज्ञापन पर बहस: कुछ लोग मानते हैं कि विज्ञापन हमारी ज़रूरतों को मैनिपुलेट करता है, जबकि दूसरे कहते हैं कि यह जानकारी देता है, प्रतिस्पर्धा बढ़ाता है और कीमतें कम रखने में मदद करता है।
गुणवत्ता का संकेत: विज्ञापन पर खर्च करने की इच्छा ही उत्पाद की गुणवत्ता का एक संकेत हो सकती है। अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाने वाली कंपनियाँ ही महँगे विज्ञापन का खर्च उठा सकती हैं, क्योंकि वे बार-बार ग्राहक आने की उम्मीद करती हैं।
निष्कर्ष:
एकाधिकारिक प्रतिस्पर्धा वैरायटी और ब्रांडिंग का बाज़ार है। लंबे समय में यहाँ कोई आर्थिक मुनाफा नहीं होता और यह थोड़ा अक्षम होता है, क्योंकि कंपनियाँ अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं करतीं और कीमतें भी लागत से ज़्यादा होती हैं। विज्ञापन और ब्रांड नाम इस खेल के सबसे ज़रूरी खिलाड़ी हैं, जो गुणवत्ता के संकेत का भी काम करते हैं।
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