कैमूर के जंगलों की अदभुद बाइक यात्रा। Kaimur Hills Yatra in Rainy Season |
Автор: Alok Desh Pandey
Загружено: 2025-09-17
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दोस्तों अबकी बार 06 अगस्त को हमने कुछ मित्रों के साथ कैमूर पहाड़ी घूमने की योजना बनाया था, 07 अगस्त को पूरा दिन रोहतास किला तक जाने में ही बीत गया। उसके बाद वहां पास के ही धनसा गांव में एक स्कूल भवन में रात्रि विश्राम की सोचे।
पिछले वीडियो में आपलोगों ने केवल रोहतास किले तक की सड़क यात्रा को देखा, उसके बाद आगे की महाजंगल की यात्रा का जो भी रोमांच हमलोगों को मिला वो सब आपसब के साथ साझा करने जा रहा हूं।
#Day_03(08 Aug): रेहल की ओर से गुप्ताधाम जाने वाली मार्ग का रोमांचक सफर...
सुबह 07 बजे तक हमलोग अपना बोरिया बिस्तर समेट गांव छोड़ दिए, और हमारे लिए अच्छी बात यह थी कि रात भर पड़ने के बाद बारिश अभी बंद थी और मौसम एकदम सुहावना।
#गुप्ता_धाम_जाने_का_मार्ग:-
निकलने से पहले गांव वालों से जो जानकारी लिए उसमें दो बातें सामने आई। पहली यह की जो 17 किलोमीटर वाला रास्ता है वह बांडा नामक एक गांव में पहुंचाता है जो गुप्ता धाम के बगल में स्थित एक पहाड़ी की चोटी पर है। हमको वहां पहाड़ी पर ही गाड़ी को खड़ा करना था और खड़े पहाड़ से पैदल उतराई उतर कर बाबा गुप्तेश्वर नाथ के दर्शन करना था फिर वापस चढ़ाई चढ़कर अपनी गाड़ी के पास पहुंचना था और फिर उसी रास्ते से वापस आना था।
उनलोगों ने एक दूसरा रास्ता भी बताया जो वहां बुधवा गांव से होते हुए मां ताराचण्डी की ओर जाता था। ताराचण्डी घाट से भी हम वाहन द्वारा कैमूर पहाड़ी पर आसानी से चढ़ और उतर सकते हैं, उसी रास्ते में मांझर कुंड भी मौजूद है। तो ताराचण्डी वाले रास्ते से ही गुप्ता धाम के किए कट जाना था।
इसके लिए हमें सबसे पहले पश्चिम की ओर बुधवा गांव जाना था वहां गांव के बगल से दाहिने उत्तर की तरफ एक रास्ता कट जाता है जो सीधे जाने पर कल्याणपुर सीमेंट फैक्ट्री के माथ (चोटी) पर पहुंचेगा। उसी के बीच में तीन सिवानी नामक जगह मिलता है जहां से हमें बाए मुड़ने बोला गया। बाए मुड़ने वाला रास्ता सीधे मां ताराचंडी घाट पर उतरेगा, इसलिए उसी रास्ते में आगे एक और बाएं कट लेना था जो गुप्ता धाम की ओर मुड़ जाता था, और वो चपरी गांव तक पहुंचाता था जो गुप्ता धाम के प्रसिद्ध पैदल यात्रा मार्ग के बीच में मिलने वाली "दुर्गा मंदिर" के पास स्थित है। यह जगह तीर्थ यात्रियों के लिए मुख्य मार्ग के रूप में प्रयोग होता है इसलिए सारी सुविधाएं होने की संभावना थी। और संभवतः जितने भी वाहन यहां पहुंचते होंगे उसी रास्ते से होते हुए पहुंचते होंगे। पिछली बार जब मैं गुप्ता बाबा गया था तो दुर्गा मंदिर के पास हमें सोने के लिए खटिया तक 40 रु के किराए में मिल गई थी। इस रास्ता का एक फायदा हमें और दिखा कि हम उसके माध्यम से वापस आकर सीधे ताराचंडी उतर जाएंगे जो सासाराम शहर के बगल में है जिससे समय पर अपने घर भी चले जाएंगे। रेहल के तरफ वापस आने से हमें सासाराम जाने के लिए 80- 90 किमी की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती। सो हमने बांडा वाला रास्ते को छोड़ यही रास्ता पकड़ लिया। और निकल पड़े महाजंगल की ओर...।
#रास्ते में अनेकों जल धाराओं से सामना और फिर अंत में वापस लौटना:-
आज यहां बारिश तो बंद हो गई थी लेकिन पिछले कुछ दिनों से लगातार हो रही बारिश के कारण पहाड़ों के जितने भी नदी नाले थे सारे उफान पर थे। इसका एहसास यात्रा के शुरुआत में ही हो गया। जब मार्ग में अनेकों छोटी छोटी जल धाराएं मिलनी शुरू हो गई। हालांकि वे सब आसानी से पार करने योग्य थी। लेकिन बुधवा गांव के पास एक बड़ी जलधारा को क्रॉस करना पड़ा। यही से एक रास्ता दाहिने तारा चंडी की ओर जा रहा था। इसके बाद से ही रास्ते और खराब होते चले गए। हालांकि वहां की मिट्टी थोड़ी पथरीली टाइप की थी सो चक्के में चिपकती नहीं थी लेकिन फिसलने का डर हमेशा बना रहता था। सो धीरे धीरे ही सही हम आगे बढ़ते जा रहे थे। कुछ समय बाद लोग दिखना बंद हो गए थे और जंगल का घनापन भी बढ़ रहा था। कुछ देर बाद चारों तरफ इतना बड़े बड़े वृक्षों वाले इतना घना जंगल दिखने लगा कि उसमें किसी का प्रवेश करना भी मुश्किल दिख रहा था, बस एक कच्ची पगडंडी के सहारे हम बढ़ रहे थे। उसमें भी कभी चढ़ाई चढ़ना पड़ रहा था तो कभी ढलान वाला रास्ता आ रहा था। रास्ते में तीन सिवानी नामक जगह मिला जहां से एक और रास्ता कटता था, वहां से हमलोग बाए मुड़ गए जो सीधे जाने पर तारा चंडी चला जाता। फिर आगे एक और जगह रास्ता कटा जहां से गुप्ता धाम जाया जाता है। वहां गुप्ता धाम का बोर्ड भी लगा था। यहां तक ही पहुंचते पहुंचते 11 बज गए थे। लेकिन इसके आगे का रास्ता और खराब मिलने लगा। लेकिन यहां से केवल उतराई शुरू हो गया और हम किसी घाटी की तरफ उतरने लगे लेकिन यहां अब घंटों बीत गए थे किसी मनुष्य को देखे। इस बीच हमलोगों ने दो तीन जल धाराएं पार किया होगा। इनमें से एक तो लगभग जांघ इतनी गहराई वाला था लेकिन बहाव जरा शांत था। उसके बाद तुरंत बाद हमें एक और जलधारा मिली जो बहुत तीव्र गति से बह रही थी। ऐसा लग रहा था कि पार करते वक्त हमलोगों को बहा न दे। हमलोगों को काफी देर हो गए थे किसी ग्रामीण को भी इधर देखे हुए। बीच सुनसान जंगल में हमलोग अकेले थे और नेटवर्क भी नहीं था। इसलिए इस दरियाव को पार करने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई। लेकिन इसके आगे ऐसी ऐसी और कितनी जलधाराएं मिलेंगी इसका भी ज्ञान न था। इसके अलावा इसी मार्ग से फिर लौटना भी था, सो हमलोगों ने नदी को नमस्कार किया फिर दूर से ही बाबा गुप्तेश्वर नाथ जी को भी नमस्कार किया और क्षमा मांगते हुए वापसी की रास्ता पकड़ लिया।
शेष विडियो में...
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धन्यवाद।
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