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What is the Evidence जानिए एविडेंस क्या होते हैं और कोर्ट में कब पेश किए जाते हैं

Автор: RV legal support

Загружено: 2023-05-17

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Описание: हेलो दोस्तों मेरा नाम और अजीत प्रताप सिंह ने आरबीडी का सपोर्ट यूट्यूब चैनल में आप सभी का बहुत-बहुत स्वागत है दोस्तों इस वीडियो में मैंने आपको बताया है Evidance के बारे में Evidence क्या होते हैं

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साक्ष्य क्या है और कितने प्रकार के होते हैं? जानिए प्रावधान


न्याय प्रशासन में साक्ष्य का महत्वपूर्ण स्थान है। साक्ष्य द्वारा ही सत्य-असत्य की खोज की जाती है। साक्ष्य के अभाव में किसी व्यक्ति को दण्डित नहीं किया जा सकता। आपराधिक मामलों में अभियोजन को अपना मामला सन्देह से परे साबित करना होता है। थोड़ा भी संदेह हो तब अभियुक्त दोषमुक्त हो सकता है।

एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा यह कहा गया है कि "साक्ष्य विधि न्यायालयों का मार्ग प्रशस्त करती है। यह ऐसे नियमों का प्रतिपादन करती है जो न्याय प्रशासन के सुचारु संचालन में सहायक होते हैं।"

समस्त न्याय प्रशासन की आधारशिला सबूतों पर ही रखी गई है। साक्ष्य के अभाव में कोई भी मामला साबित नहीं किया जा सकता है। इस आलेख में भारतीय साक्ष्य अधिनियम,1872 के अधीन रहते हुए सबूतों के प्रकार पर चर्चा की जा रही है।

साक्ष्य क्या है


साक्ष्य अनेक रूपों में प्रचलित शब्द है, जैसे- प्रमाण, सबूत, पुरावा आदि। यह इंग्लिश भाषा के 'Evidence' शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। शब्द 'Evidence' की व्युत्पत्ति मूलतः लैटिन भाषा के शब्द 'Evidence' से हुई है जिसका अर्थ है- किसी तथ्य को विधिक साधनों द्वारा स्पष्ट रूप से साबित करना, दिखाना अथवा निश्चित करना।


भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 3 के अनुसार


"साक्ष्य शब्द से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आते हैं-


(क) वे सभी कथन, जिनके जाँचाधीन तथ्य के विषयों के सम्बन्ध में न्यायालय अपने सामने साक्षियों द्वारा किये जाने की अनुज्ञा देता है या अपेक्षा करता है, ऐसे कथन मौखिक साक्ष्य कहलाते हैं।


(ख) न्यायालय के निरीक्षण के लिए पेश की गई सब दस्तावेजें, ऐसी दस्तावेजें दस्तावेजी साक्ष्य कहलाती हैं।"


भारतीय साक्ष्य अधिनियम में यह साक्ष्य की शाब्दिक परिभाषा नहीं है। यह केवल साक्ष्य के दो प्रकारों- मौखिक साक्ष्य एवं दस्तावेजी साक्ष्य, का उल्लेख करती है।


'शपथ पत्र' को साक्ष्य नहीं माना गया है। यह साक्ष्य तभी हो सकता है जब न्यायालय द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाये। समाचार पत्र की रिपोर्ट को भी साक्ष्य नहीं माना गया है।


साक्ष्य के प्रकार

साक्ष्य के अनेक प्रकार हैं
-

(1) प्रत्यक्ष साक्ष्य (2) परिस्थितिजन्य साक्ष् (3) प्राथमिक साक्ष्य(4) गौण साक्ष्य(5) वास्तविक साक्ष्य(6) अनुश्रुत साक्ष्य(7) मौखिक साक्ष्य(8) दस्तावेजी साक्ष्य(9) न्यायिक साक्ष्य(10) न्यायेत्तर साक्ष्य


इन सभी पर विस्तारपूर्वक चर्चा यहां इस आलेख में प्रस्तुत की जा रही है-

. प्रत्यक्ष साक्ष्य

साक्ष्य विधि में प्रत्यक्ष साक्ष्य का महत्वपूर्ण स्थान है। न्यायालय भी प्रत्यक्ष साक्ष्य को प्रामाणिक मानता है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 60 में भी यह कहा गया है कि- "प्रत्येक मौखिक साक्ष्य प्रत्यक्ष होना चाहिये।"


प्रत्यक्ष साक्ष्य से अभिप्राय ऐसे तथ्य की साक्ष्य से है जिसका साक्षी ने स्वयं अपनी इन्द्रियों से बोध किया है।


दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष साक्ष्य से अभिप्राय ऐसी साक्ष्य से है-


(i) जो यदि किसी देखे जाने वाले तथ्य के बारे में है तो साक्षी यह कहता है कि 'उसने देखा है' इसे चक्षुदर्शी साक्षी भी कहा जाता है जिसने किसी भी घटना को साक्षत देखा है या अनुभव किया है।


(ii) जो यदि किसी सुने जाने वाले तथ्य के बारे में है तो साक्षी यह कहता है, कि 'उसने सुना है, ' और


(iii) जो यदि इन्द्रियों द्वारा बोध किये जाने वाले तथ्य के बारे में है तो साक्षी यह कहता है कि उसने अपनी 'इन्द्रियों से बोध किया है।'


उदाहरणार्थ- 'क' पर 'ख' की हत्या करने का आरोप है। 'ग' न्यायालय में यह कहता है कि 'उसने 'क' को 'ख' पर तलवार से वार करते देखा है। यह प्रत्यक्ष साक्ष्य है। इसे प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य भी कहा जाता है।


2. परिस्थितिजन्य साक्ष्य

जब किसी तथ्य को साबित करने के लिए प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं होता है तब ऐसे तथ्य को साबित करने के लिए 'परिस्थितिजन्य साक्ष्य' का सहारा लिया जाता है।


परिस्थितिजन्य साक्ष्य से अभिप्राय ऐसी परिस्थितियों के बारे में साक्ष्य से है जो घटना के इर्द-गिर्द घूमने वाले तथ्य का सबूत होती है जिनके अवलोकन से यह पता चलता है कि कोई घटना घटी है।



न्याय प्रशासन में यह कहा जाता है कि "साक्षी झूठ बोल सकता है लेकिन परिस्थितियाँ नहीं।"


परिस्थितिजन्य साक्ष्य की ग्राहयता के लिए मुख्य दो बातें आवश्यक है-

(i) परिस्थितियों को संदेह से परे साबित किया जाना, एवं

(ii) परिस्थितियों का मुख्य घटना से निकट का सम्बन्ध होना।


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