हर बार मज़दूर ही क्यों करें समझौता? | मीठे लफ़्ज़ों के हर वार से डर लगता है (गीत)
Автор: Vivek Dayal
Загружено: 2026-02-24
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हर बार मज़दूर ही क्यों करें समझौता? मीठे लफ़्ज़ों के हर वार से डर लगता है — यह सिर्फ एक कविता या गीत नहीं, बल्कि हर उस मज़दूर की आवाज़ है जो मीठी बातों, झूठे वादों और मालिकों के अहंकार के बीच अपना हक़ ढूँढ रहा है।
यह हर उस मज़दूर की आवाज़ है जो मीठी बातों, झूठे वादों और मालिकों के अहंकार के पीछे छिपे शोषण को पहचान चुका है।
जब सम्मान के नाम पर समझौता कराया जाए,
जब तरक्की के नाम पर इंतज़ार कराया जाए,
जब मुनाफ़े के लिए इंसानियत तौली जाए —
तब शब्द भी हथियार बन जाते हैं।
यह गीत मज़दूर, शोषण, स्वाभिमान, संघर्ष और सामाजिक सच्चाई की कहानी है।
जब मीठे शब्द हथियार बन जाएँ, तब सच्चाई बोलना भी बगावत लगता है।
क्यों मज़दूर ही हर बार झुके?
क्यों हर समझौता उसी के हिस्से आए?
अगर यह गीत आपके दिल को छू जाए, तो वीडियो को शेयर करें और अपनी राय कमेंट में ज़रूर लिखें।
🎧 हेडफोन लगाकर सुनें — भाव और भी गहरे महसूस होंगे।
© 2026 Vivek Dayal
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