" श्री रामचरितमानस का अमृत - बालकाण्ड दोहा "[छत्तीसगढ़ी भाषा मे पहली बार''राम'' नाम की धूनी-171-190]
Автор: छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
Загружено: 2026-01-03
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इस प्रस्तुति में रामचरितमानस के बालकाण्ड के दोहा क्रम 171 से 19 0 को
अवधि भावानुवाद (श्लोक रूप) तथा छत्तीसगढ़ी भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है।
इन दोहों का मूल भाव यह सिखाता है कि- राम ज्ञान, तप या तर्क से नहीं,
सच्चे प्रेम और भक्ति से भक्त के हृदय में बसते हैं।
राम नाम कलियुग का सबसे बड़ा औषधि है,
जो पाप, दुख और अज्ञान को दूर कर
जीवन को शांति, सुख और मुक्ति की ओर ले जाता है।
यह संकलन भक्ति, प्रेम और सरल लोकभाषा के माध्यम से
राम तत्व को जन-जन तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है।
सारांश (दोहा 171–190)
इन दोहों में राम–सीता विवाह से लेकर बालकाण्ड के मंगल समापन तक की कथा का भावपूर्ण प्रवाह है—
जनकपुर का उल्लास (171–173): जनक सभा मंगलमय होती है। विवाह समाचार से अयोध्या और मिथिला—दोनों नगर दीप-दीपावली जैसे सजते हैं, जन-मन हर्षित होता है।
अयोध्या से बरात (174–175): दशरथ गुरु वसिष्ठ से मंत्र-विचार कर भव्य बरात के साथ मिथिला प्रस्थान करते हैं।
विवाह महोत्सव (176–180): रघुकुल रीति के अनुरूप मंगल गान, राजाओं का ससम्मान मिलन, चारों भाइयों का विवाह, अग्नि साक्षी—धर्म, प्रेम और मर्यादा की प्रतिष्ठा।
विदाई और अयोध्या आगमन (181–185): कन्यादान का करुण–पावन क्षण, सीता की विदाई, मार्ग में सर्वत्र मंगल, अयोध्या में दीपोत्सव-सा स्वागत।
गृहस्थी का आरंभ व लोककल्याण (186–189): दशरथ–कौसल्या का आनंद, राम–सीता के गृहस्थ जीवन से प्रजा के भय-दुख का नाश, जहाँ प्रभु चरण पड़ें वहाँ मंगल।
बालकाण्ड समापन (190): राम नाम–जस का महात्म्य—जो सुनता-गाता है, वह भवसागर तर जाता है।
निष्कर्ष: यह खंड मंगल, मर्यादा और प्रेम की विजय कथा है—व्यक्ति, परिवार और समाज तीनों के लिए आदर्श स्थापित करता हुआ बालकाण्ड का सुखद अंत।
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